ठिठुरती काँपती उँगलियाँ
तैयार नहीं छूने को कलम
कैसे लिखूँ कविता मैं
सर्दी ने ढाया सितम
शब्द मेरे ठिठुरे पड़े हैं
भाव सभी शुन्य हुए हैं
कंठ से स्वर निकलते नहीं
लगता सब जाम हुए हैं
धूप भी किसी भिखारिन सी
थकी हारी
आती है
कभी कोहरे की चादर ओढे
गुमसुम सो जाती है
गरम चाय, नरम रजाई
अब यही सुखद सपने हैं
कैसे छोड़ूँ इनको अब मैं
लगते यही बस अपने है
घर से बाहर निकले कैसे
दाँत टनाटन बजते है
मौसम की मनमानी देखो
कैसे षड़यंत्र ये रचते हैं
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महेश्वरी कनेरी
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