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Thursday, 9 January 2014

सर्दी ने ढाया सितम



ठिठुरती काँपती उँगलियाँ 
 
तैयार नहीं छूने को कलम

कैसे लिखूँ कविता मैं

सर्दी ने ढाया सितम

शब्द मेरे ठिठुरे पड़े हैं

भाव सभी शुन्य हुए हैं

कंठ से स्वर निकलते नहीं

लगता सब जाम हुए हैं

धूप भी किसी भिखारिन सी

 थकी हारी आती है 

कभी कोहरे की चादर ओढे

गुमसुम सो जाती है

गरम चाय, नरम रजाई

अब यही सुखद सपने हैं

कैसे छोड़ूँ इनको अब मैं

लगते यही बस अपने है

घर से बाहर निकले कैसे

दाँत टनाटन बजते है

मौसम की मनमानी देखो

कैसे षड़यंत्र ये रचते हैं


******************

महेश्वरी कनेरी

Thursday, 14 March 2013

देव आशीष


देव आशीष
अचरज़ भरे खोल नयन,
टुकुर टुकुर देख वो मुस्काया
उतर कर नन्हा चाँद जैसे
 गोदी में मेरे आ समाया
झूम झूमकर ,चूम रहा
 मस्तक पवन भी इठलाके
भोर ने भी किया स्वागत
 किरणों की थाल सजाके
सरस अनुभूति का
 अहसास जगा विहल मन में
खिल उठा नवल धूप
 आज फिर मेरे आँगन में
धन्य हुई ,नत मस्तक हूँ
 पाकर ये आशीष तुम्हारा
कोटि-कोटि नमन प्रभु ,
सब में बसा स्वरूप तुम्हारा
****************
महेश्वरी कनेरी
मित्रों आज बहुत समय बाद वापस ब्लांग जगत में लौटकर आई हूँ..कारण .मेरे घर एक नन्हा सा मेहमान मेरा पोता आया है. जिसने मेरे वक्त को अपने ही इर्द गिर्द
चारों तरफ घेर कर रख दिया..चाह कर भी समय निकाल नहीं पारही हूँ.शायद यही है मोह माया का बधंन.....लेकिन ये बंधन भी बहुत प्यारा लगता है..

Friday, 10 February 2012

कविता

कविता
अविरल कल-कल
भावों की बहती सरिता
कभी युगों का कभी
मन का दर्पण कविता

सुखद अनुभूति की
सतरंगी संसार कविता
कभी भूखे की रोटी
कभी तलवार की धार कविता

कभी सखी ,कभी बेटी सी
मुखरित प्यार कविता
कभी जीवन का आधार
कभी पतवार कविता

सदियों से गुंजित जग में
जन-जन की आवाज़ कविता
मन में उठते भावों
की परवाज कविता

ह्रदय भूमि में उपजी
लहलहाती गाती कविता
पल्लवित पुष्पित होकर
बढ़ती  जाती कविता
******
महेश्वरी कनेरी