abhivainjana


Click here for Myspace Layouts

Followers

Monday, 12 November 2012

मिलकर मनाएं चलो दिवाली





मिलकर मनाएं चलो दिवाली
रह जाए न देखो ,कोई कोना खाली
घर –घर दीपों की झड़ी लगादें
मिलकर मनाएं चलो दिवाली……

नव ज्योति के झिलमिल पंखो से
आओ हटा दें हर घर से अँधेरा
करें जगमग आस किरणों को
लाएं फिर एक नया सवेरा
मिलकर मनाएं चलो दिवाली…..

चमक रोशनी की कुछ ऐसी हो
कि राह भटक जाए ‘अंधेरा’
फिर कभी न हो किसी ह्रदय में
उदासी का यूँ गहन बसेरा
मिलकर मनाएं चलो दिवाली....

 मानव के ह्रदय भूमि पर,
जलती रहे सदैव दिव्य प्रकाश
फिर आलैकिक होगा घरती पर
दिव्यता का सघन आभास 
मिलकर मनाएं चलो दिवाली….
**********************


दीपावली की सभी मित्र बंधुओ को हार्दिक 

शुभकामनाएं

 महेश्वरी कनेरी

Saturday, 3 November 2012

मंज़िल तेरी उस पार है



थकना नहीं ,ओ पंछी मेरे
मंज़िल तेरी उस पार है
पंख फैला ,उड़ता चल
हर सांस में विश्वास भर
उड़ते हुए आकाश पर
कैसी थकन कैसी तपन
भूल तन के पीर को
श्रम से किस्मत बदल
बाधाओं से डरना नहीं
राह में रुकना नहीं
चाहे घनेरी रात हो
लक्ष पर रख कर नज़र
तू चल अपनी डगर
चिंता तज ,मत हो विकल
क्यों बहाता नीर रे ?
छल से बुना संसार है
निकल इस जंजाल से
चलना अभी दूर है
थकना नहीं ओ पंछी मेरे
मंज़िल तेरी उस पार है
***************
महेश्वरी कनेरी

Monday, 22 October 2012

ये वक्त भी बदल जाएगा



खामोश है आज चाँदनी भी
खामोश धरती आसमां है
खामोश हैं तारे सभी
खामोश उनका कारवां है
शाख के हर पात खामोश है
खामोश हुए प्रकृति के हर साज़
हवा भी थक कर सो गई अब
खामोश लहरों के गीत आज
बस,खामोश नहीं मेरे मन का शोर
कुछ बैचैन हैं ,परेशान सा
अनबुझ प्रश्नों का सैलाब लिए
उठता है दिल में बस तूफान 
अब तो खामोश हो जा मन मेरे
ये तूफा़न भी टल जायेगा
कल सूरज के आते ही ,देखना
ये वक्त भी बदल जाएगा
************
महेश्वरी कनेरी

Friday, 12 October 2012

और मैं रिश्ते बोती रही


मैं तो रिश्ते बोती रही
पर ये कंटक कहाँ से उगते गए..
मेरे मन स्थिति से विपरीत
ये मेरे फूल से अहसासों को छलनी करते रहे
और मैं रिश्ते बोती रही
स्नेह का खाद डाल
प्यार से सिंचित करती रही
रोज़ दुलारती सवाँरती
पर ये गलत फहमी के फूल कहाँ से उग आए
 दिनों दिन जो बढ़ते ही गए
और मैं रिश्ते बोती रही
एक अहम के बीज से कितनी दीवारें उग आई
जहाँ आरोपों क़े कील से नफरत की खूँटियाँ गड़ती रही
प्रेम प्यार सभी लहू लुहान होते रहे
और मैं रिश्ते बोती रही
****************
महेश्वरी कनेरी

Sunday, 7 October 2012

जीवन के रंग

जीवन के रंग


मन में उमंग
ह्रदय में तरंग
अपनों के संग
यही जीवन के रंग
पुल्कित अंग अंग
न सोच हुई तंग
न विचारों में जंग
न सपने हुए भंग
देख रह गई दंग
सीख गई जीने का ढंग
अगर लेखनी हो संग
भरती रहूँ जीवन में रंग
रंग ही रंग ,रंग ही रंग
****************
महेश्वरी कनेरी

Wednesday, 3 October 2012

जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है..



जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है , तो चलो जी के देख लें
दर्दे दिल ही जब दवा बन जाए, तो चलो पी के देख लें

बेवजह पड़ी हुई थी जिन्दगी, काटे नही कटती थी जिन्दगी
अपने लिए बहुत जी लिए, औरों के लिए भी जी कर देख लें

चलना ही जिन्दगी है अगर, तो फिर धूप क्या छाँव क्या है
फूल से राहों में सब चलते हैं, काँटो में भी चल कर देख लें 

दुनिया के इस अपार भीड़ में, कुछ अपने कुछ पराए भी हैं
अपनों को तो देख लिया अब, गैरों को भी अपना के देख लें

 उदास आँखें ,गुमसुम चेहरा ,जमाना बीत गया शायद हँसे हुए
खुद तो बहुत हँस लिए अब ,चलो उसे् भी हँसा के देख लें

आसमां छूने की जि़द है अगर ,तो हौसले बुलन्द चाहिए
पंखो से करना क्या है,चलो आसमां को ही झुका के देख लें
***************
महेश्वरी कनेरी

Sunday, 23 September 2012

पगली की बेटी



बच्चे ताली बजाते
पगली-पगली कह चिल्लाते
बड़े , हट पगली कह धुतकारते
उसकी मासूम हरकतों पर हँसते
और… रात को …
अपनी हवस मिटाने उसे ले जाते
बचा कुचा खाना किसी ने डाल दिया तो खा लिया
नही तो कूड़े मे से कुछ ढ़ूँढ
अपना गुजारा कर लेती
मन का दर्द समझ नहीं पाती
पर ,तन के  दर्द से सुबक जाती
एक दिन लोगों का
कुकर्म बोल उठा…
और वह गर्भवती हो गई
प्रसव पीड़ा से दोहरी होती देख
कुछ भले लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचा दिया
और वहाँ पर मैं पैदा हो गई
बिन बाप की बेटी…
मुझे देख माँ ने मुँह फेर लिया
और ज़ोर-जो़र से चिल्लाने लगी
 शायद परेशान होगी
बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए
उनके माथे पर लोग काला टीका लगा देते है
पर मैं तो कलंक का टीका लगा कर ही पैदा हुई थी
मुझे क्या नज़र लगेगी..
माँ, कभी मुझे अपनी छाती से घंटों चिपकाए रखती
कभी जमीन पर पटक कर जो़र-जो़र से हँसती
सोचती होगी, मैं उसके लिए वरदान हूँ या अभिशाप.
मेरा और बच्चों की तरह नामकरण तो नहीं हो पाया
पर लोग मुझे -पगली की बेटी कह कर पुकारने लगे
धीरे-धीरे मैं बड़ी होती गई और
माँ कमजो़र होती रही
लोगों से जो मिल जाता
वही खाकर हम दोनों गुजारा कर लेते
अब लोगों की नज़रें माँ पर कम
मुझ पर अधिक पड़ने लगी
एक दिन मैं खाने के लिए कुछ जुटाने निकली
आकर देखा तो माँ के आस पास भीड़ लगी थी
पता चला कि वो इस स्वार्थी दुनिया को छोड़ कहीं दूर चली गई
माँ को तो अपने दर्द से छुटकारा मिल गया
अब मेरा क्या होगा..?
मेरे सामने एक चुनौती  थी
इस दरिंदे समाज से क्या मैं
खुद को बचा पाऊँगी..? उनसे लड़ पाऊँगी…?
या फिर माँ की तरह ढह जाउँगी…..????
**************
महेश्वरी कनेरी