थकना नहीं ,ओ पंछी
मेरे
मंज़िल तेरी उस पार
है
पंख फैला ,उड़ता चल
हर सांस में विश्वास
भर
उड़ते हुए आकाश पर
कैसी थकन कैसी तपन
भूल तन के पीर को
श्रम से किस्मत बदल
बाधाओं से डरना नहीं
राह में रुकना नहीं
चाहे घनेरी रात हो
लक्ष पर रख कर नज़र
तू चल अपनी डगर
चिंता तज ,मत हो विकल
क्यों बहाता नीर रे
?
छल से बुना संसार है
निकल इस जंजाल से
चलना अभी दूर है
थकना नहीं ओ पंछी मेरे
मंज़िल तेरी उस पार
है
***************
महेश्वरी कनेरी
