अहसास
माँ
ह्रदय में वात्सल्य का सागर
होठों में दुलार की
मुस्कान
आँखों में ममता के
आँसू
यही तो है माँ
की पहचान
रंग
रंगों का संसार निराला
है
हर रंग में खुद
को ढ़ाला है
कुछ रंग से खुशी
चुराई
कुछ रंग में दर्द
को पाला है
धुँआ
कहीं कोई चिंगारी नहीं
हर सांस पर जुल्म
का पहरा
सब तरफ धूँआ ही
धुँआ
जितना उभरते उतना ही
गहरा
बागवान
मन के धरातल में
जब भी हसरतों के
फूल खिलते हैं
अपना ही बागवान नोंच
कर बिखेर देता
है
जुल्म
हादसों की इस ज़मीन
पर
हर रोज़ जुल्म उगा
करते हैं
जुल्म के इन पौधे
से
दर्द और आँसू ही बहा
करते हैं
जलती लौ
पिघलते मोम की जलती लौ हूँ
कब पिघल कर ढल जाऊँ
जब तक सांस है तन पर
तब तक जलती ही जाऊँ
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महेश्वरी कनेरी
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