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Saturday, 20 February 2016

जिन्दगी यूँ ही चलती रहती है (कहानी)



                       जिन्दगी यूँ ही चलती रहती  है

               ( कहानी )

   सर्दी हो,गर्मी हो या फिर बरसात ,देहरादून में तीनों ही मौसमों का अपना अलग ही अंदाज है और हमेशा ही अपनी विशेष पहचान बनाए रखते हैं
   यहाँ के जाड़ों का तो जवाब ही नही ,रात को रजाई में घुस कर मूँगफली खाते हुए टी.वी. देखने का मजा़ कुछ आलग ही होता है और सुबह की हल्की गुनगुनी सी धूप में बैठना स्वर्गीय़ आनंद देजाता है..हमारे घर में तो सुबह चाय नाश्ता,दिन का खाना और शाम की चाय तक सब बाहर लांन में ही बैठ कर किया जाता है .बस एक बार धूप में बैठ जाओ तो अंदर जाने का मन ही नही करता ,जहाँ जहाँ घूप सरकती, हमारी कुर्सियाँ भी वही वही खिसकने लगती है । पहले तो शाम होते ही अँगीठियाँ जला दी जाती थी,पर अब  तो रुम हीटर और ब्लोवर ने अँगीठियों की जगह ही ले ली ।
    हैदराबाद से जब भी मेरी बेटी फोन करती 

अकसर यही पूछती और ..माँ धूप सेक रहे हो ? वो

 यहाँ के जाड़ों को आज भी मिस किया करती है,

लेकिन इस बार इत्तफाक से जनवरी की कड़कती ठंड़ 

में उसका यहाँ आना हुआ ,बस फिर क्या था .

.नाश्ते का मैन्यू हर रोज बदलने लगे

,कभी आलू के भरे पराठे, कभी गोभी के तो कभी 

मूली के,और कभी तोर की दाल का भरा पराठा.सारा 

दिनखाने पीने और गपशप में ही निकल जाया तरता था
.
   एक दिन अचानक बैठे बैठे प्रोग्राम बन गया कि 

चलो आज डीनर बाहर किया जाए. इसी बहाने थोड़ा

चेंज भी हो जाएगा और घर की औरतों को थोड़ा

आराम भी मिल जाएगा ,बस फिर क्या था शाम की 

चाय के बाद ही बाहर जाने की तैयारी शुरु हो गई ।

    आज सुबह  से  ही धूप थोडी़ हल्की सी थी

और,शाम होते होते तो बादलो ने आसमान  में अपना

 डेरा ही डालना शुरु कर लिया ,ठंड़ भी कुछ बढ़ने

 लगी  थी कही बारिश न हो जाए इस डर से हमने

 सोचा यही कहीं आसपास ही जाएं और जल्दी ही घर

 वापस आ जाएंगे .ठीक सात बजे के लगभग हम घर

 से निकले , रेस्टुरेन्ट  ज्यादा दूर न था बस दस

मिनट में ही वहाँ पहुँच गए ।

   गाडी़ पार्क करते ही हम सभी आगे की ओर बढ़ ही रहे थे कि  ,अचानक मुझे लगा कोई मुझे आवाज दे रहा है,मैंने पीछे मुड़ कर देखा, एक बारह-तेरह साल का दुबला पतला सा लड़का गेहुँवा रंग, गोल-गोल सी उदास आँखे,फटे हाल कपड़ों में सर्दी से काँप रहा था,मैने पूछा क्या बात है ? बहुत ही धीमे स्वर में घबराते हुए वो  बोला,‘माँ बहुत भूख लगी है,’ मैंने ध्यान से उसे देखा, सच में ही वह भूखा ही लग रहा था. मुझे दया आगई  पर अगले ही पल मैने इस तरह तो हम बच्चों में भीख माँगने की प्रवृति को बढ़ावा दे रहे है,इसका अंजाम बुरा भी होसकता है, तभी मेरी बेटी मेरे पास आकर बोली देदो न माँ उसे कुछ पैसे ,भूखा है बेचारा, क्या सोच रही हो ? अनमनी सी होकर मैंने पर्स में से दस का एक नोट निकाल कर उसके हाथ में रख ही रही थी कि,तभी बेटी फिर बोल पड़ीमाँ , कम से कम बीस तीस  तो देदो बेचारे को,दस रुपए में क्या आएगा,होटल में भी तो हम सौ पचास तो बैरे को टिप में यूँ ही देदेते है,मैने सोचा ठीक ही कह रही है फिर पर्स में से बीस का एक नोट निकाल कर उस के हाथ में रख दिए ,आश्चर्य से वह उस नोट को देखता रहा जैसे उसे विश्वास ही नही होरहा हो उसकी उदास आँखों मे चमक सी आगई थी, शायद धन्यवाद देने के लिए वह मेरे पैरो की ओर थोड़ा झुका फिर वहाँ से तेजी से भाग गया , अब तक घर के बाकी लोग होटल के अंदर जा चुके थे ,
    खैर अंदर पहुँच कर देखा सब के सब मैनू कार्ड में आँखे गड़ाए बैठे हुए थे. पति देव पूछने लगे कहाँ रह गए थे भई ? मैने .कुछ नहीं ऐसे ही कहते हुए बात टाल दी ,और एक मैनू कार्ड अपनी ओर सरकाकर देखने लगी ,थोड़ी देर में बच्चों की अलग  और बड़ो की अलग फरमाईशो की लिस्ट बनने लगी,खैर दोनों को बैलेन्स कर हमने खाना आडर कर दिया
      खाना खाते खाते हमें वही नौ बज चुके थे.मुझे चिन्ता थी कही बारिश न हो जाए फिर ठंड भी तो बढ़ रही थी,पर बच्चे कहाँ मानने वाले थे जाते जाते आईसक्रीम की फरमाईश भी कर दी, लगभग दस बजे हम घ्रर पहुँचे, हल्की हल्की बूँदा बाँदी भी शुरु हो गई थी, जल्दी से कपड़े बदल कर सभी अपनी अपनी रजाई में घुस गए ,जैसे बहुत थक गए हो कभी कभी बीना काम के भी हम  बहुत थक से जाते हैं वही हुआ  ,सोचा कल सुबह थोड़ा आराम से ही उठुँगी  घूमने नही जाऊँगी बारिश भी हो रही है अगर एक दिन नही भी गई तो क्या हो जाएगा, मन को समझा बुझा कर सो गई।
    अचानक फोन की तेज़ घंटी ने मुझे जगा दिया,आजकल जितनी सुविधाए हैं उतनी  मुसीबत भी, मैं झल्ला कर उठी और फोन उठाया हेलो! उस तरफ से आवाज़ आई अरे !”अभी तक सो रही हो क्या ? आज घूमने नही जाना  हम आप के गेटके बाहर ही खड़े हैं जल्दी  आजाओमेरी सुने बगैर ही फोन काट दिया,जाने कहाँ की जल्दी थी ,मै मन ही मन बड़बड़ाई, खैर खिड़की से पर्दा हटा कर देखा अभी भी झुरमुठ सा अंधेरा था लेकिन आसमान बिल्कुल साफलग रहा था ,अनमने मन से उठी जल्दी जल्दी गरम कपड़े पहनेऔर सर्दी से बचने के लिए खुद को अच्छी तरह्से लपेटा और बाहर निकल आई सामने ही मिसेज शर्मा और उनकी छोटी बहन खड़ी थीं,जो आजकल दिल्ली से आई हुई हैं ।
    मिसेज शर्मा हमारी बहुत ही अच्छी पड़ोसन है दोनों ही पति पत्नि बहुत सुलझे हुए मिलनसार और हँसमुख स्वभाव के है उनके दो बच्चे दोनों ही अमेरिका में सैटल हैं,अकेले होकर भी वे कभी अकेलापन मह्सूस नही करते और न ही पडो़सियों को करने देते हैं दोनों ही बहुत जिन्दादिल इंसान है,मिसेज शर्मा अकसर मुझे कहा करती है छोड़ो बहुत हो गया घर का काम. कभी अपने लिए भी समय निकल लिया करो ,वैसे सच ही कहती है ,हम औरतो के पास अपने लिए समय ही कहाँ होता है ,सुबह से शाम तक घर का काम खत्म ही नही होता ।
   मुझे आते देख कर मिसेज शर्मा मुस्कुराती हुई बोलीसब ठीक तो है नमैं भी सिर हिला कर हल्के से मुस्काई और हम आगे बढ़ गए ।
     खुला आसमान, साफ सुथरी सडक, , हल्की लालिमा लिए सूर्य की किरणॆ मानो धरती पर आने को ललायित हो और मसूरी की ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ हिम की सफेद चादर ओढे मानो रात की कहर बयाकर रही हो, तीखी ठंड़क लिए हवा भी इधर उधर डॊल रही थी बेचारे सड़क के आवारा कुत्ते मारे ठंडके अपनी दोनो टांगों के बीच सिर छुपा कर सोए पड़े थे,कही कही इक्के दुक्के लोग ही सड़को पर दिखाई देरहे थे,रात की बारिश ने कितनों को सोने नहीं दिया होगा और जो सो भी गए उन्हें उठने नही दिया होगा  
      तेज़ कदम बढ़ाते हुए हम गाँधी पार्क के नजदीक पहुँच गए गेट के सामने ही बडी भीड़ सी लगी हुई थी,उत्सुक्तावश हम भी वहाँ पहुचे,पूछने पर पता चला कि कल रात की भीषण ठंड़ ने एक बालक की जान ले ली ,मै अपने को रोक नपाई और भीड़ को चीरती हुई उसतक पहुँच गई.देख कर चौक गई अरे !ये तो वही है जो कल रात हमें मिला था और उसे मैने पैसे भी दिए थे, मैं इतनी धबरा गई कि किसी से कुछ न कह सकी बस देखती रही उसका सारा शरीर ठंड़ से अकड़ा हुआ था कपड़े भीगे हुए थे और गीले बाल माथे पर बिखर गए थे,
    कल और आज यानी जीवन और मृत्यु इंसान को कितना लाचार बना देता है कल तक जो जीने के लिए संघर्ष कर रहा था आज हार कर हमेशा के लिए सो गया,लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे, तभी मेरी नज़र सामने पानी में तैरते हु्ये एक खाली पूडे पर पडी़ जो इस बात की गवाही दे रहा था कि वह भूख से तो नही मरा होगा मुझे यह जान कर थोड़ी तसल्ली् सी मिली .
  तभी पार्क का चौकीदार वहाँ आ पहुँचा कहने लगासाब ये करीब एक हफ्ते से अकसर यहाँ आया करता था ,कल रात जब मैं गेट बंद करने आया तो तब भी ये यही बैठा हुआ था मैने कहा भी बारिश होने वाली है ठंड भी बढ़ रही है जा घर जाफिर खुद ही कहने लगा, ‘साब घर होता तो जाता न ,नजाने कहाँ से आया माँ बाप है भी या नही , कुछ पता नही
तभी वहाँ खड़े एक सज्जन बोलने लगे,’मैने भी एक दिन इससे कहा, कहाँ भीख माँगता मारा-मारा फिर रहा है चल मेरे घर चल तुझे काम भी सीखाऊँगा और खाना भी खिलाऊँगा लेकिन घर का नाम सुनते ही उसका मुख सफेद पड़ गया और वहाँ से भाग गयालोगो की बातें मेरे कानो में पीघले हुए शीशे कि तरह पड़ रही थी मै अधिक देर तक वहाँ खडी न रहसकी तभी कुछ पत्रकार हाथो में कैमरा लिए वहाँ आ पहुँचे लोगो से कुछ पूछताछ की और एक आध फोटो खींची और चले गए ,बाकी की कहानी तो उनके पास होती ही है.मैं सोच रही थी कभी कभी किसी की मौत किसी के जीविका का साधन बन जाती है
   मन बहुत दुखी था,एक अजीब सी बेचैनी थी ,हम वापस घर लौट आए, घर पहुँच कर अंदर जाने का मन ही नही हुआ बस सीधे ही छत पर चली आई.आसमान साफ और शान्त सा दिख रहा था.सब कुछ वैसा ही था जैसे कुछ हुआ ही ना हो पर मन मे प्रश्नो का बहुत शोर था ,पर कहीं कोई उत्तर न था सूरज की किरणे धीरे धीरे धरती पर समाहित होने लगी सड़को पर गाडिया दौडने लगी घर घर में बच्चे जाने की तैयारी कर रहे थे पडोस मे लगातार कुकर की बजती सीटी ने मेरा ध्यान भंग कर दिया और अचानक मुझे याद आया अरे! आज तो मेरी बेटी ने वापस अपने ससुराल लौटना है,मै जल्दी से नीचे उतर आई देखा तो सब उठ चुके थे और चाय की इंतजारी हो रही थी और मै बिना किसी से कुछ बोले ही अपने कामो मे लग गई
  किसीके चले जाने से कुछ भी नही रुकता जिन्दगी यूँ ही चलती रहती  है, यही जिन्दगी है शायद…..
        *********************
                   महेश्वरी कनेरी 
    
     


  
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Thursday, 3 April 2014

रिटायर्डमेंट पार्टी ( कहानी )

             
                 रिटायर्डमेंट पार्टी ( कहानी )
      सुबह जल्दी जल्दी काम निपटा कर जैसे ही चाय का गिलास लिए आँगन में बैठी ही थी कि पडोस के शर्मा जी के घर से आवाज सुनाई देने लगी- “जल्दी करो,शाम की तैयारी भी करनी है और पड़ोसियों को भी तो खबर देनी  है..अरे सुनो शाम को कौन सा सूट पहनोगे ? निकाल के तो रख दूँ।मैं सोच में पड़ गई आज इनके यहाँ क्या है जो इतनी तैयारी चल रही है ।थोड़ी ही देर में देखा कि शर्मा जी बन ठन कर अपनी चमचमाती हुई गाडी में आफिस को निकल पड़े ।खैर जो भी होगा देखा जाएगा सोचकर मैं भी अपने कामों में लग गई ।थोड़ी देर में देखा कि शर्मा जी की पत्नी मुस्कुराते हुए हमारे घर आ पहुँची ,मैंने उन्हें बैठने का इशारा किया और कुछ पूछने ही वाली थी कि वो झट से मेरे पैरों को छू कर बोली माता जी आशीर्वाद दीजिए आज शर्मा जी रिटायर्ड हो रहें है । इसी खुशी में शाम को हमने एक छोटी सी पार्टी रखी है होटल रीजेंट में आप भी बच्चों के संग जरूर आईएगा कहकर वो चली गई ।
   मैं सोचती रही शादि ब्याह ,मुंडन जन्म-दिन की पार्टी तो सुनी पर ये रिटायर्डमेंट की पार्टी..? मेरी समझ में कुछ नहीं आया,शायद वक्त बदल गया है वक्त के साथ परिस्थितियाँ भी तो बदल जाती है ।जब नन्दू के बापू रिटायर्ड होकर घर पहुँचे थे तो कितने उदास लग रहे थे, उनका चेहरा आज भी भुला नहीं पारही हूँ ।उस दिन तो चूल्हा जलाने का भी मन भी नही हुआ था ।
    रिटायर्ड होने से एक वर्ष पहले ही से वे चिंता में पड़ गए थे । एक बेटी की तो जैसे तैसे ब्याह कर दी थी पर उसके कर्ज़ से अब तक उभरे नहीं थे कि दूसरी बेटी भी तैयार खडी थी, मकान की मरम्मत का काम पड़ा हुआ था ।नन्दू की भी तो पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी , इतना सारा खर्च और महंगाई भी इतनी, दिन रात इसी चिंता में रहते, सिर्फ पेंशन से कैसे गुजारा होगा । मैं उन्हें हिम्मत बँधाती रहती चिंता मत करो जी सब ठीक हो जाएगा।
   रिटायर्डमेंट पर जो भी थोड़े बहुत पैसे मिले उस में से कुछ मकान की मरम्मत में निकल गए,बाकी छोटी बेटी की शादि में खर्च होगए ।दुबारा नौकरी करने के सिवा और कोई चारा भी तो न था । काफी दौड़ भाग के बाद इन्हें एक छोटी सी फैक्ट्री में हिसाब किताब का काम मिल गया ।तनख्वा बहुत कम थी,काम बहुत अधिक था क्या करते मजबूरी थी ,कई बार तो काम घर पर लाकर रात भर जाग कर काम किया करते थे जिससे किसी तरह जिन्दगी की गाडी ठीक से चलती रहे
    एक दिन अचानक वे फैक्ट्री से जल्दी घर वापस आगए ,पूछने पर कहने लगे बस थोड़ा चक्कर सा आगया था । थोड़ा आराम करूँगा तो ठीक हो जाएगा ।मैनें उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ठीक है आराम करो मैं चाय लेके आती हूँ ।
चाय लेके जैसे ही मैं कमरे में पहुँची ,मैंने धीरे से हिला कर कहा उठो कुछ खा पीलो तो जी को अच्छा लगेगा ।बहुत हिलाने पर भी नही उठे तो मैं घबरा गई और जोर से नन्दू को आवाज दे कर बुलाया । किसी तरह उन्हें अस्पताल लेगए वहाँ पता चला कि उन्हें अटैक पड़ गया था ।
    इलाज के बाद जब ये ठीक होकर घर आए तो मैंने उनसे कसम लेली अब नौकरी पर नहीं जाओगे । नन्दू की पढाई लगभग खत्म ही हो चुकी थी,उसे कहीं न कही नौकरी मिल ही जाएगी ।
    धीरे धीरे समय बीतता गया। ऐसा लगने लगा था हमारे अच्छे दिन फिर करवट बदल कर वापस लौट रहें हैं । नन्दू को भी बैंक में अच्छी नौकरी मिल गई थी , एक अच्छी सी लड़की देख कर उसकी शादि भी कर दी । अब इनकी सेहत में भी काफी  सुधार आ गया था ।
     लेकिन खुशियों को हमारे घर अधिक रास नहीं आया। एक रात नन्दू के बापू ऐसे सोये कि सुबह का सूरज देख ही नहीं पाए और उसी दिन से मेरी जिन्दगी भी अंधेरों से घिर गई थी ।
     आज पूरे पाँच वर्ष होगए इन्हें गए हुए,ऐसा लगता है जैसे आज कि ही बात हो । जब भी घर में पालक का साग बनता था,कहते थे सुनो पालक में थोड़ा पनीर भी डाल देना”,मैं झटक कर कहा करती,”नही ! कितनी महँगी है पनीर, फिर आप के  सेहत के लिए भीतो ठीक नही।आज भी इनकी ये आवाज मेरे कानों में अकसर गूँजा करती है ।
    “दादी,दादी ओ दादी ! उठो क्या सोच रही हो इतनी देर से ? शाम को पार्टी में भी तो जाना है मम्मी कह रही थी ,आप भी चलोगी न  हमारे संग?” मैंने उसके गालों में प्यार से थपथपाते हुए कहा नही बेटा तुम लोग हो आओ मेरा मन कुछ ठीक नही है ।
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               महेश्वरी कनेरी

Sunday, 5 January 2014

बच्चों के खातिर


मित्रों नये वर्ष में ये मेरा नया प्रयोग है..पहली बार कहानी लिखने का प्रयास किया है उम्मीद है मेरे इस प्रयोग को भी अप सभी स्नेह देंगे और साथ ही सुझाव भी ....धन्यवाद..

              बच्चों के खातिर  
    शापिग कामप्लेक्स में घुसते ही जोरदार स्लूट मारकर जिस गेटकीपर ने दरवाजा खोला,उसे देखते ही मैं अवाक रह गई।अचानक मुँह से निकल पड़ाअरे! श्यामलाल यहाँ कैसे ?..  कैसे हो?” उसके जवाब देने से पहले ही मैं फिर बोल उठीरिटार्ड हो गए क्या? वह झेपता हुआ सा हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया  
   श्याम लाल हमारे स्कूल में एक क्लास फोर कर्मचारी था । अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आराम की जिन्दगी बसर कर रहा था
    अचानक कुछ समय बाद पता चला कि उसकी पत्नी को कैंसर होगया । हँसमुख श्याम लाल अब उदास रहने लगा । बहुत इलाज करवाया पर कोई फायदा नहीं,बीमारी अंतिम चरण पर थी।एक दिन पता चला कि उसकी पत्नी चल बसी ।
   पत्नी के इलाज में बेचारे श्याम लाल पर काफी कर्ज होगया था ।उसने हिम्मत नही छोड़ी दिन रात और भी अधिक मेहनत करने लगा। हम लोग अकसर उससे कहा करते –“अरे श्याम लाल कभी तो आराम कर लिया करो
जवाब में वह यही कहता –“साब ! बेटा पढ़ लिख कर अपने पैरों में खड़ा होजाए ,बेटी अपने घर चली जाए, बस तभी आराम करूँगा।
    इस बीच मेरा दूसरे शहर में तबादला होगया था और बारह साल बाद आज अचानक मुलाकात हो गई ।गहरे स्लेटी रंग की वर्दी पहने ठकठकाते काले बूट और रंगे हुए काले बाल ।उसका ये नया रुप देख कर मैं दंग रह गई थी ।
     उसकी चुप्पी देख कर मैंने फिर प्रश्न दाग दिया- बच्चे कैसे हैं ? बिटिया की शादी होगई?” अचानक मैंने देखा उसकी आँखे डबड़बा आई ।मैं हैरान थी इसे क्या होगया । मैने धीरज देते हुए उससे फिर पूछा–“अरे क्या हुआ? क्या बात है ? बताओ तो ?” मेरे इतने सारे प्रश्न पूछने के बाद उसने अपनी आँखें पोछी और धीरे से कहने लगा –“साब! क्या बताऊँ बेटा पढ़ाई पूरी न कर पाया ,गलत संगती में पड़ गया था  । उसे शराब और जुए की लत लग गई,आए दिन पुलिस पकड़ कर लेजाती है और मारती पीटती है छुड़वाने के लिए बार -बार उन्हें पैसे देना पड़ता है । बाप हूँ न कैसे देख सकता हूँ।“ “और बेटी..? उसकी शादी होगई ?” मैने फिर पूछा । आँखें पोछते हुए कहने लगा उसकी तो बड़े धूम-धाम से शादी कर दी थी दामाद भी अच्छा मिल गया था ,पर भाग्य देखो! एक बस दुर्घटना में उसकी मौत होगई और घर वालों ने उसे अपशगुनी कहकर घर से निकाल दिया, उसकी छह महिने की बच्ची भी है अब वह मेरे पास ही रहती है । सोचा था रिटार्ड्मेंट के बाद आराम करूँगा ,पर क्या करूँ ? इन बच्चों के खातिर नौकरी करने के लिए निकल पड़ा । बूढे को कौन नौकरी देता है साब ! इसी लिए बालों को रंग कर जवान होने का ढ़ोंग करता हूँ ।बच्चों के लिए क्या-क्या करना पड़ता है ?“ कहते कहते वह दौड़ कर फिर किसी दूसरे कस्टमर के लिए दरवाजा खोलने और स्लूट बजाने के लिए चल पड़ा और मै देर तक उसे देखती ही रही ।
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                  महेश्वरी कनेरी