abhivainjana


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Saturday, 28 August 2021

सावन पर कुछ दोहे

 झूले सावन के पड़े,

गाए गीत हजार ।

बरखा के सुर ताल पर, 

धरा करे श्रृंगार ।। 

          मोती बन बूंदे गिरी,

           हरित पात पर आज 

          देख देख मुस्का रही

         लिए अजब अंदाज।।

  अंबर पर बादल सजे,

   ज्यूं मोती की थाल।

  गिर बूंद बन पात पर,

  हुई धरा खुश हाल।।

               गगन बना घनघोर हैं

               बूंद बनी उल्लास । 

              भीग  रहे तन मन सखी

                लो आया चौमास॥

नव वधु सी धरती सजी ,

 हरियाली चहुं ओर।

हर्षित उपवन गारहे,

देख सुखद ये भोर।।

                 डाल सजी  पाती हरी,

                     खिलते फूल सफ़ेद ।

                     सोच सोच हैरान सब

                       मिला न कोई भेद।।

                            ********"

3 comments:

  1. अति सुन्दर दोहे । आपको देखकर अच्छा लगा ।

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  2. मुझे आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी। इसे पढ़कर मुझे बारिश का मौसम याद आ गया। आपने हर दृश्य को इतने आसान और सुंदर शब्दों में बताया कि मैं सब कुछ साफ देख पाया। जिस तरह आपने धरती को नई दुल्हन की तरह दिखाया, यह बहुत अच्छा लगा। हर लाइन में खुशी और सुकून महसूस हुआ।

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