abhivainjana


Click here for Myspace Layouts

Followers

Wednesday, 5 September 2012

गुरु महिमा


गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।

   आज ५ सितम्बर है,यानी शिक्षक दिवस । आज के दिन हम प्रत्येक उन महानुभूतियों को याद करते हैं तथा श्रद्धा पूर्वक शीश झुकाते हैं जिन्होंने हमारे जीवन दर्शन को किसी न किसी रुप में प्रभावित किया है वही हमारे गुरू हैं ।कभी माता पिता ,कभी संगी साथी , कभी अध्यापक तथा कभी शिक्षक के रुप में आकर हमारे जीवन को सजाते सवारते हैं वे सभी हमारे गुरु है ।
“गु” शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और “रू” शब्द का अर्थ है प्रकाश (ज्ञान) अज्ञान को नष्ट करने वाला  जो ब्रह्म रुपी प्रकाश है, वह गुरु है
भारतीय संस्कृति में गुरु को सर्वोपरी माना गया है ,यही हमारी संस्कृति का मूल मंत्र भी है
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णुः
गुरुर्देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात परब्रह्मा
तस्मै श्री गुरवे नमः"

भारतीय संस्कृति में गुरु और शिष्य का प्रमुख स्थान रहा है,हमारी संस्कृति का नींव भी इसी पर आधारित है ।श्री बुद्ध आनंद, श्री रामकृष्ण विवेकानंद जैसे गुरु शिष्य का यशोगान हमेशा से होता रहा है । विख्यात कवि तथा सच्चे समाज सुधारक कबीर दास जी की पंक्तियाँ
               गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है, गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट
भीतर हाथ सहारियाबाहर मारे चोट .."

अर्थात गुरु कुम्हार है, जो शिष्य रुपी घड़े को पीट-पीट कर उसे सही आकार देते हैं और साथ ही साथ अंदर से हाथ का सहारा भी देते रहते हैं । गुरु शिष्य संबंध को समझने के लिए ये बहुत अच्छा उदाहरण है ।
      प्रचीन काल में गुरु शिष्य के संबंधो का आधार था- गुरु का ज्ञान,उनकी मौलिकता और उनका नैतिक बल , शिष्य के प्रति उनका स्नेह तथा ज्ञान बाँटने का निस्वार्थ भाव शिष्य में भी गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा,गुरु की क्षमता पर पूर्ण विश्वास तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव ,अनुशासन तथा आज्ञाकारिता होती थी
आचार्य गुरु चाणक्य के अनुसार एक आदर्श शिष्य के क्या गुण होने चाहिए…

काकचेष्टा बकुल ध्यानं श्वान  निद्रा तथेव 
                 अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थीनाम पंचलक्षणं “

गुरु और शिष्य के बीच में केवल शाब्दिक ज्ञान का ही आदान प्रदान नहीं होता था बल्की गुरु अपने शिष्य के संरक्षण के रुप में कार्य करते थे,उनका उद्देश्य होता था शिष्य का समग्र विकास शिष्य को भी गुरु पर पूर्ण विश्वास होता था कि गुरु कभी उनका अहित सोच ही नही सकते यही विश्वास उनकी अगाध श्रद्धा और समर्पण का कारण रहा था।
गुरु का आदर्श एक लम्बी परम्परा रही है पर इस पावन परम्परा पर  कुछ गंभीर अपवाद भी लगे हैं।
एक्लव्य की कहानी कौन भूला सकता है जिन्होंने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर  धनुर्विद्या स्वयं ही सीखी थी लेकिन द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रुप मे उनके दाहिने हाथ का अंगुठा ही माँग लिया था
लेकिन आज समय बदल गया है मान्यताएं बदल गई है समाज अधिक जागरुक होगया है किसी गुरु के द्वारा अपने शिष्य के प्रति ऐसा अन्याय हो जाए तो वह चुप नहीं बैठेगा और उसका विरोध अवश्य करेगा
आज ज़रुरत है गुरु और शिष्य अपने अंतरात्मा में झाँके और सोचें कि गुरु शिष्य के संबंधो में आरही गिरावट को कैसे रोका जाये और कैसे इस रिश्ते की गरिमा को बनाएं रखें
                          ********************
     शिक्षक दिवस की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं
                     महेश्वरी कनेरी

Monday, 27 August 2012

वक्त की हेरा फेरी



वक्त की हेरा फेरी

कहने के लिए तो सफर में बहुत मिले
कुछ अपने ,कुछ पराए
न शिकवे थे न शिकायत
फिर भी..
जब होश आया
तब देखा..
कब अपने पराए हुए
और पराए कब अपने
वक्त की ये कैसी हेरा फेरी है
*********

तन्हाई
जब भी मन को टटोला
एक सूना पन बाहर आया
 और ये कह कर मुस्काया
जिन्दगी पहुँच चुकी है
उस मुकाम पर जहाँ तन्हाई
तन्हाई सिर्फ तन्हाई
**************

क्यों
हँसते-हँसते क्यों आँसू निकल आते है..?
और चलते-चलते क्यों साए भी छॊड़ जाते है ?
**********

जिन्दगी की चाक

जिन्दगी की चाक पर
हम तो सब को अपना बनाते चले थे
लेकिन व्यवहार की भट्टी पर आते ही
सब फटने फूटने और बिखरने लगे..
***************
महेश्वरी कनेरी

Monday, 20 August 2012

हमारे बुजुर्ग..

हमारे बुजुर्ग..


हर बढ़ते कदम
उम्र की उस चौखट तक
पहुँचा देते हैं
जहाँ से लौट नही सकते
बस रह जाती हैं यादें,
और अनुभवों की एक भारी सी गठरी
बहुत कुछ कहने का मन करता है
पर सुनने वाला कोई नहीं
नितांत अकेला खालीपन लिये
सफर बोझिल सा लगता है
पर जीने की चाह नहीं मिटती
निढ़ाल शरीर, लड़खड़ाते कदम
आँखों में अपनों की चाहत लिए
आशीष लुटाते,
हमारे बुजुर्ग..
जिन्हें बेकार और बोझ समझ
किसी कोने में रख,भुला दिया जाता है
क्या सच हैं..?
 बुढ़ापा ! एक बोझ है..
परिवार के लिए..
एक अवरोधक
इस प्रगतिशील समाज के लिए ..
सोचो !..सोचो जरा..
मनन करो
कुछ विचारो
क्यों कि..
 कल हमें भी
उसी चौखट से गुजरना है
***********
महेश्वरी कनेरी..

Wednesday, 15 August 2012

सच्ची आजा़दी के लिए..



पैंसठवे स्वतंत्रता दिवस
और ..तेरे आँखों में आँसू..?
याद कर …माँ
इसे पाने के लिए
कितने खून बहे
कितनी कोख उजड़ी
कितनों की माँग सूनी हुई
तब जाके ये आजादी मिली
उस वक्त तेरी आँखों में
आँसू नहीं,अंगारे थे
एक जुनून था
अपने घर को बचाने का
अपने बच्चों को आजा़दी दिलवाने का
तू लहूलुहान होती रही
और लड़ती रही
अंत मे जीत हमारी हुई
 और हम स्वतंत्र हो गए
आज पौंसठ वर्ष पूरे हो गए हैं
खुशियां मना ,ये उदासी ठीक नहीं
मुझे मालूम है..
तेरी उदास आँखे बता रही है
तेरा मन अंदर ही अंदर रो रहा है
और चीख- चीख कर कह रहा है
“मैंने ऐसी आजा़दी तो नहीं चाही थी
जिसमें भाई भाई के खून का प्यासा हो
धर्म और जाति के नाम पर दीवार खड़ी हो
सब तरफ भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार
अपने अपनों को नोच कर खाने को तैयार  “
सच है..ये सब सच है.. माँ !
पर उदास होने से क्या होगा ?
माना कि तेरे कुछ बच्चे रास्ता भटक गए हैं
पर ,उन्हें अब सही रास्ते पर लाना होगा
अगर इस दर्द से आजाद होना है तो आओ
एक और जंग की तैयारी करें
पहले अपनों के लिए लड़े थे
आज अपनों से लड़ना होगा…
अपनों के लिए अपने देश के लिए
और सच्ची आजा़दी के लिए..
फिर से लड़ना होगा…
*****************

स्वतंत्रता दिवस की सभी मित्रों को हार्दिक शुभ कामनाएँ!

महेश्वरी कनेरी

Saturday, 11 August 2012

मैं फिर आऊँगा…



प्रस्तुत पंक्तियाँ उन स्त्रियों को समर्पित है जिनके पति उन्हें अकेला छोड़ इस दुनिया से कहीं दूर चले जाते हैं… और दे जाते है  एक दर्द और अकेलापन । अपनी रोती बिलखती सहचरी का ये दर्द उससे देखा नहीं जाता और जाते जाते अपने मूक होठॊं से ये संदेशा देता जाता हैं…….और .यही संदेशा उसकी प्रियसी  की ताकत और हिम्मत बन जाती है..जीने के लिए और क्या चाहिए….?
मैं फिर आऊँगा…
मत होना उदास प्रिये तुम
मैं फिर आऊँगा…
कभी भोर की किरणें बन
कभी साँझ की लाली बन
आँगन में तेरे बस जाऊँगा
मैं फिर आऊँगा…..
जो पल हमने साथ गुजारे
याद कर उनको मत रोना
कभी सावन का मेघ बन
कभी जलधार बन
 आँगन में तेरे बरस जाऊँगा
मैं फिर आऊँगा……
ठंडी हवा का झोंका
जब तुम को छू कर निकले
उसे मेरा अहसास समझना
कभी ओस की बूँद बन
कभी फूलों की खुशबू बन
 आँगन में तेरे खिल जाऊँगा
मैं फिर आऊँगा…
वक्त के रुपहले सायों को देख
तुम मत घबराना
कभी सबल शक्ति बन
कभी आस विश्वास बन
मैं तुम्हारे ही साथ रहूँगा
मैं फिर आऊँगा….
अकेली समझना न खुद को कभी
हर मोड़ पर मुझको पाओगी
कभी वृक्षो की छाह बन
कभी तुम्हारा साया बन
जीवन पथ पर साथ चलूँगा
मैं फिर आऊँगा….
मत होना उदास प्रिये तुम
मैं फिर आऊँगा
मैं फिर आऊँगा
**************
महेश्वरी कनेरी

Monday, 6 August 2012

पता न था वक्त ऐसे बदल जाएगा




एक आग सी जलती थी मुझ में
आज राख का एक ढ़ेर हूँ मैं
मत छेड़ना इसे तुम
वरना सब कुछ बिखर जाएगा
पता न था वक्त ऐसे बदल जाएगा

अलमस्त सा उड़ता था गगन में
आज पंखहीन सा लाचार हूँ मैं
मत पूछना कुछ मुझे तुम
वरना दर्द फिर जाग जाएगा
पता न था वक्त ऐसे बदल जाएगा

एक खुशनुमा इमारत था कभी मैं
आज खंडहर बन गया हूँ मैं
मत छूना इसे कभी तुम
वरना गिरकर ढह जाएगा
पता न था वक्त ऐसे बदल जाएगा

वक्त का कफ़न ओढ़े
मौत से लड़ रहा हूँ मै
रोकना मत मुझे तुम
वरना मौत फिर जीत जाएगा
पता न था वक्त ऐसे बदल जाएगा
*******************
महेश्वरी कनेरी