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भोर की पहली किरण |
अँधेरी रात की
काली चादर को चीर
भोर की पहली किरण
जब धरती पर आई
सारी धरती सिन्दूरी रंग में रंगी
नव वधु सी शरमाई
शीतल मंद पवन ने छेड़ा
फिर जीवन का राग सुहाना
हिम शैल शिखर से फिसलती किरणें
घाटी पर आ सुस्ताई
अलसाई कलियों ने आँखें खोली
देख गुंजित भँवरे मुस्काए
रात कहर से भीगी थी
जो पलके फूलों की
चूम-चूम किरण
उनको सहलाए
निकले नीड़ से आतुर पंछी
स्वच्छंद गगन पर पंख फैलाए
दूर कहीं मंदिर की घंटी
मधुर ध्वनि से मुझे बुलाती
सत्यम शिवम सुन्दरम ,बस
यही भोर है मुझको भाती
यही भोर बस मुझे सुहाती
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महेश्वरी कनेरी
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