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Saturday, 21 July 2012

भोर की पहली किरण

भोर की पहली किरण 

अँधेरी रात की
 काली चादर को चीर
भोर की पहली किरण
जब धरती पर आई
सारी धरती सिन्दूरी रंग में रंगी
नव वधु सी शरमाई
शीतल मंद पवन ने छेड़ा
फिर जीवन का राग सुहाना
हिम शैल शिखर से फिसलती किरणें
घाटी पर आ सुस्ताई
अलसाई कलियों ने आँखें खोली
देख गुंजित भँवरे मुस्काए
रात कहर से भीगी थी
जो पलके फूलों की
चूम-चूम किरण
उनको सहलाए
निकले नीड़ से आतुर पंछी
स्वच्छंद गगन पर पंख फैलाए
दूर कहीं मंदिर की घंटी
मधुर ध्वनि से मुझे बुलाती
सत्यम शिवम सुन्दरम ,बस
यही भोर है मुझको भाती
यही भोर बस मुझे सुहाती 
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महेश्वरी कनेरी