दीया एक शरीर है, बाती उसकी आत्मा , तेल ,धड़कता हुआ दिल । जिस दिन तेल खत्म होजाए यानी दिल धड़कना बंद कर दे..उस दिन बाती रुपी आत्मा कहीं विलीन हो जायेगी | बस ये नश्वर दीया रूपी शरीर फिर मिट्टी की मिट्टी…
मैं स्वयं जल कर लोगों को उजाला बाँटती हूँ.. फिर भी जब लोग कहते हैं ‘दीया तले अँधेरा”
मैं समझ नहीं पाती , सच में उन्हें मुझ से सहानुभूति है या फिर मेरी बेबसी का मजाक उड़ाते हैं ….
बेटा माँ से पूछता है ..माँ रात को सूरज क्यों छिप जाता है ?
माँ- बेटा ! जगमगाते दीये की सुन्दर शीतल रौशनी से शर्माता है शायद ,इसीलिए छिप जाता है ।
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