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Wednesday, 27 July 2011

वो अद्भुत पल

   वो अद्भुत पल
    भले ही जिन्दगी को एक सुहाना सफर कहा जाता हो ,लेकिन इस सफर में कब क्या हो जाए कुछ पता नहीं ।पल में खुशी,पल में गम , पल में दुख ,पल में सुख । जिन्दगी को समझ पाना वाकई इतना आसान भी तो नहीं है । बस इसे ईश्वर का प्रसाद समझ , खुशी-खुशी ग्रहण करना ही हमारी नियति है, चाहे मुस्काते होठों से करें या डबडबाती आँखों से ।
   मेरे जीवन में भी एक घटना ऐसी घटी जिसे मै आप सब से बाँटना चाहती हूँ। उस अद्भुत क्षण को आज भी याद करते ही मन कुछ अनमना सा और उदास हो जाता है भगवान से पूछ ही बैठती हूँ – हे ईश्वर ! इतनी बड़ी खुशी और उतना ही बड़ा दुख दोनों एक साथ मेरी झोली में क्यों डाल दी ? अगर देना ही था तो कुछ अंतराल में दे देते . मैं तो दोनों के साथ न्याय भी न कर पाई । एक तरफ तो मुझे सम्मान की वो ऊँचाई दिखा दी ( जो सब का सपना होता है )और दूसरी तरफ मेरे सिर से मेरी माँ का साया ही उठा लिया । विधि का विधान देखो जब मैं खुशियों का आसमान अपनी बाँहों में समेटे फूली न समा रही थी,तो दूसरी तरफ मेरी माँ का पार्थिव शरीर जमीन में पडा़ पथराई आँखों से मेरी राह देख रहा था ।
लगभग एक महीना पूर्व मुझे सूचना मिली कि ५ सिताम्बर २००० को अध्यापक दिवस के उपलक्ष में राष्ट्रपति अवार्ड से मुझे सम्मानित किया जा रहा है। सारा घर खुशियों के माहोल में डूब गया । मुझे मेरे मित्रों और विद्यालय अधिकारियों से बधाइयाँ मिलने लगी । मै मन ही मन बहुत खुश थी और अपने स्वर्गीय पिता जी को ये सम्मान समर्पित करना चाहती थी । उन्हीं की दी हुई शिक्षा संस्कार और जीवन के अमूल्य अनुभव, जिनका ये परिणाम स्वरुप था । आज होते तो कितना खुश होते ।वे मुझे हमेशा कहा करते “तू बेटी नही ,मेरा बेटा है “। मैं भी उनके इस आशा को बनाए रखने की पूरी कोशिश करती रहती ।
   पिता के मृत्यु के बाद माँ अकेली होगई थी ,इसलिये हम उन्हें अपने साथ ले आये । शूगर और ब्लड्प्रेशर जैसे बीमारी से जूझती माँ को जब पता चला कि मैं दिल्ली राष्ट्रपति अवार्ड लेने जारही हूँ तो वे बहुत खुश होगई ।बार बार उनका एक ही रट था मैं तूझे अवार्ड लेते टी.वी. में देखूँगी ।
२ सितम्बर को माँ को हरिद्वार अपनी छोटी बहन के पास छोड़ कर मै अपने पति के साथ दिल्ली रवाना हुई । दिल्ली पहुँच कर भारत के विभिन्न विद्यालयों से आए अघ्यापक और अघ्यापिकाओं से मिल कर बहुत खुशी हुई । इतना सम्मान और आदर मिल रहा था कि मैं थोड़ी देर के लिए तो खुद पर गर्व करने लगी थी ।
   दिनांक ३ को दिल्ली दर्शन ४ को ग्रेन्ड रिहर्सल  में दिन निकल गया पता भी नहीं चला ।,उधर मेरी माँ अपनी बेटी को टी.वी. मे देखने की चाह लिए जिन्दगी और मौत से लड़ रही थी ।उन दिनों मोबाईल फोन का प्रचलन नहीं था। दिनांक ४ की शाम को मेरे पति ने एस. टी. डी. जाकर हरिद्वार फोन मिलाया । बार –बार मिलाने पर भी जब किसी ने नहीं उठाया तो उनका माथा ठनका और देहरादून फोन करने पर पता चला कि आज ही सुबह वे हम सब को अकेला छोड़ हमेशा के लिये चली गयी । उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनके प्राण,उनके अपने ही घर पर निकले, उनकी इसी इच्छा को पूरी करने के लिए उन्हें उन के निवास स्थान देहरादून में लाया गया ।
    जब मेरे पति को सारी घटना का पता चला तो दुखी होने के साथ –साथ वे धर्म संकट में भी पड़ गए कि ये दुखद समाचार मुझे बताए या नहीं, मेरी खुशी ,मेरा उत्साह मेरा सपना जिसे तोड़ कर अचानक उसे दुख और संताप में बदल डालने की हिम्मत नहीं जुटा  पारहे थे । इन्होंने सोचा समाहरोह के समाप्त होते ही सब बता देंगे। लेकिन वे अपना उदास चेहरा और बैचेनी मुझ से अधिक देर तक छिपा नहीं पाये। रात को खाना खाने के बाद मेरे बार –बार पूछ्ने पर उन्हें बताना  ही पडा़ ।सब कुछ बताने के बाद मुझे ऐसे देखने लगे ,मानो कोई बच्चा चोरी करते हुए पकड़ा गया हो…।
 अगली सुबह दिनांक ५ सितम्बर को सम्मान समारोह में ठीक नौ बजे पहुँचना था । मैं रात भर रोती रही । सुबह सूरज की पहली किरण को देख मैं समझ नहीं पारही थी कि वे मेरे साथ खुशियाँ बाँटने और मुझे बधाई देने आए है या दुख की इस घड़ी में मेरे साथ शोक में शामिल होने । बड़ी विकट मन स्थिति से गुजर रही थी मैं…
    मेरे पति पूरे समय एस.टी.डी.में ही वहाँ की और यहाँ की भी स्थिति सम्भाले हुये थे । सब ने यही सलाह दी कि अगर अभी सुबह ही समारोह छोड़ कर देहरादून को रवाना होते है तो शाम तक ही पहुँच पाएंगे ,अगर समारोह में भाग लेकर आज रात की ट्रेन पकड़ते है तो सुबह पहुँच जाएँगे । जो भी क्रिया-कर्म होगा वो सुबह ही होगा । अंत में सभी की राय और ईश्वर इच्छा मान कर भारी मन से समारोह में जाने के लिए तैयार हुई ।

 बार बार माँ का चेहरा आँखों के सामने आता रहा और मैं बाहर से मुस्काती रही । कैसा अद्भूत पल था वो.. जब मैं जीवन की सच्चाई से लड़ रही थी । कार्य-क्रम समाप्त होते ही हम जल्दी से रेलवे स्टेशन पहुँच गये । अगली सुबह जैसे जैसे हम घर के नजदीक पहुँच रहे थे , दिल की धड़कने और तेज़ होती जारही थी। दूर से ही लोगों की भीड़ दिखाई देने लगी । आस-पास के लोग ,नाते रिश्तेदार सभी पहुँच चुके थे बस हमारा ही इंतजार था । किसी तरह गिरते पड़ते मैं माँ के पार्थिव शरीर के करीब पहुँची । सफेद साड़ी में लिपटी हुई , बेहद शान्त चेहरा, मानो थक हार कर अभी-अभी सोई हों । दुख- दर्द से दूर ,मोह माया के बँधन को तोड़ कही दूर… दूसरी ही दुनिया में चली गयी थी। शरीर जरूर यहाँ था , लेकिन आत्मा तो पहले ही परमात्मा में विलीन हो चुका था 
थोड़ी देर में माँ की अन्तिम यात्रा की तैयारी होने लगी । मुझे याद है माँ अकेलेपन से बहुत घबराती थीं , लेकिन अपनी यात्रा पथ पर उस दिन वे अकेली ही चल पड़ी थी…”राम नाम सत्य है…” की गूँज ने वातावरण को और भी अधिक गमगीन बना दिया था । मन जो़र-जो़र से दहाड़े मार कर रोने को कर रहा था , लेकिन किसी तरह अपने आप को रोक कर अन्य काम में खुद को व्यस्त कर रही थी 
     अब दबे शब्दों में कुछ लोग पूछने भी लगे थे-“ दिल्ली का प्रोग्राम कैसा रहा ? अच्छा किया अटेन्ड कर लिया नहीं तो अफसोस ही रहता ”……..पर मैं तो आज भी समझ नही पारही हूँ.. मैंने सही किया या गलत……. पर ईश्वर ने जो भी किया , ठीक ही होगा…शायद यही मेरी नियति भी थी…  ……….लेकिन आज मुझे ऐसा लग रहा है ,आप लोगों के सम्मुख दिल खोल देने से मन बहुत हलका हो गया है……….. बहुत-बहुत धन्यवाद………..         
     ईश्वर मेरे माता-पिता की आत्मा को शान्ति दें…………

मेरे पूज्यनीय माता-पिता


Sunday, 17 July 2011

मेरी प्यारी बेटी


     आज मेरी बेटी का जन्म दिन है । समय कैसे निकल जाता है । मानो कल की ही बात हो –उसकी छोटी-छोटी खुशियाँ .छोटी-छोटी जरूरतें , छोटे-छोटे सपने कब बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों में बदल गए , पता ही नहीं चला । मुझे अपनी बेटी पर  बहुत गर्व है । ईश्वर सभी को ऎसी बेटी दे……
प्रस्तुत कविता मैं उन सभी बेटियों को समर्पित करती हूँ जिन पर उनके माता-पिता को गर्व है……..
            मेरी प्यारी बेटी
पलकों में पली साँसों में बसी माँ की आस है बेटी
हर पल मुस्काती गाती एक सुखद अहसास है बेटी

      गहन अंधेरी रातों में जैसे, भोर की उजली किरन है बेटी
       सूने आँगन में खिली, मासूम कली की सी मुस्कान है बेटी

मान अभिमान है बेटी, दोनों कुलों की लाज है बेटी
दुख दर्द अंदर ही सहती,एक खामोश आवाज़ है बेटी

      तपित धरती पर सघन छाया सी, शीतल हवा है बेटी
      लक्ष्मी दुर्गा सरस्वती सी,बुजुर्गो की पावन दुआ है बेटी

करते विदा जब डोली में,तब पराई होजाती है बेटी
उदास मन सूना आँगन, फिर बहुत याद आती है बेटी
*****

Wednesday, 13 July 2011

एक रोचक यात्रा

हैदराबाद सिटी
प्रिय मित्र बन्धु गण..आप सभी की शुभकामनाओ के फल स्वरुप मैं अपने अत्यंत रोचक लघु  यात्रा से सकुशल वापस लौट कर पुन: आप सब के बीच आगई हूँ और मैं बहुत ही सुखद सुन्दर अहसासो को अपनी यादों की झोली में समेट कर ले लाई हूँ ।जिन्हें मैं आप सब के साथ बाँटना चाहती हूँ ।

चार मीनार

ये है निज़ामों की नगरी हैदराबाद –जिसने अपने गर्भ में न जाने कितनी ऎतिहासिक घटनाएँ कहानियों के रुप में संजोकर रखी हैं


ओल्ड हैदराबाद में लाट बाजा़र- जहाँ पुरानी सभ्यता और संस्कृति की झलक आज भी देखने को मिलती है

यहाँ बाजार में स्त्रियों के लिए साज सज्जा की सभी चींजें हैं  

शिल्पारमन हाट
आईए अब आधुनिक हैदराबाद हाईटैक सिटी की कुछ झलक देखे 
Mall

           रामूजी फिल्म सिटी जो पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण है          

Fundustan in Ramu ji film city
In Ramu ji film city
Snow world
Switzerland in Hyderabad
जी हाँ  यहाँ सब बर्फ ही बर्फ है-अब गर्म प्रदेश में भी स्नोफाल का मज़ा ले सकते हैं 
हैदराबाद आकर भी यहाँ की बिरयानी नही खाई तो ….. बिरयानी की इंतजा़र में मेरा परिवार

बार-बार कहने को मन करता है “मेरा भारत महान” । सच में आज यहाँ क्या नहीं जो विदेशों में है
जो यहाँ है वो विदेशों में नहीं -यहाँ की सभ्यता यहाँ की संस्कृति यहाँ की आस्था….. संक्षेप में
हैदराबाद मुस्लिम और हिन्दु संस्कृति और सभ्यता का मिलाजुला शहर है……..
................

Thursday, 30 June 2011

जल्दी ही मिलती हूँ…


मेरे प्रिय मित्र बन्धु गण..
कुछ दिनों के लिये मैं बाहर जारही हूँ अत:  आप लोगों से सम्पर्क न हो पायगा , इसके लिये क्षमा चाहती हूँ ।लौट कर सभी कुछ तसल्ली से पढ़ूँगी.. इस बीच मुझे नहीं भूलाना । जल्दी ही मिलती हूँ…………धन्यवाद…

Saturday, 25 June 2011

हर बार परीक्षा लेती है जिन्दगी………

“सारे दुख मेरे भाग्य में ही क्यों ? मेरे साथ् ही येसा क्यों होता है ?” यही सब नकारात्मक सोच हमारे विकास  की राह में बाधा  उत्पन्न करती हैं । सोच का मन से  बहुत गहरा संबंध है अगर हमारा मन प्रसन्न है तो सब कुछ अच्छा लगता है , अगर मन दुखी और परेशान है तो पूरा संसार बेगाना सा लगता है ,कुछ भी अच्छा नहीं लगता है । प्रस्तुत पंक्तियों में इसी भाव को 
उजागर करने की कोशिश की है ।“

हर बार परीक्षा लेती है जिन्दगी

क्यों कभी इतनी हैरान परेशान सी लगती है जिन्दगी   ?
कभी तो गहन अनुभूति लिए तृप्त सी लगती है जिन्दगी

क्यों कभी मुट्ठी में रेत सी फिसलती ,दिखती है जिन्दगी   ?
कभी ढलती संध्या भी, भोर की किरन सी दिखती है जिन्दगी

क्यों कभी पानी के बुलबुले सी अस्तित्वहीन लगती है जिन्दगी  ?
कभी तो अल्मस्त स्वच्छन्द नदी सी गुनगुनाती है जिन्दगी

क्यों कभी बादलों के बीच सहस्त्र बूँद सी छटपटाती है जिन्दगी  ?  
कभी तो बसंत में खिले फूलों की ताजगी लिए महकती है जिन्दगी

क्या है सब ?  क्यों करती है  भ्रमित, मुझे हर बार जिन्दगी
क्यों पग पग पर, इस तरह, हर बार परीक्षा लेती है जिन्दगी…………??



Saturday, 11 June 2011

हे राह बटोही ...

हे राह बटोही , तू चलता चल
हे राह बटोही , तू चलता चल
जब तक साँस चले, तू चलता चल
रूप बदल- बदल, जग तूझे भरमाएगा
दृढ्ता का देख तेज़, स्वयं झुक जाएगा
 नई उमंग भर मन में ,नई तरंग जगा
 छाँट तंद्रा के बादल,फिर कर्म बोध जगा
सुख हो जाए बोना.दुख बन जाए बिछौना
कर लेना संधि उनसे फिर आगे बढ़ना
जीवन का सूनापन ,जब तूझे खलेगा
हर पथ पर तेरे,आशा का दीप जलेगा
टूटे हर विश्वास को, जोड़्ता चल
हे राह बटोही , तू चलता चल
जब तक साँस चले, तू चलता चल
हे राह बटोही , तू चलता चल...

Saturday, 4 June 2011

ग्यारहवा पोस्ट… आभार


आप सभी का आभार  
हमारे यहाँ  ग्यारह नम्बर को शुभ तथा गतिमान कहा जाता है……और् यह बताते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है कि यह मेरा ग्यारहवा पोस्ट है। जो आप सभी के प्यार और शुभकामनाओ का प्रतिफल है ।जिसे मैं आभार के रुप में आप सभी भाई ,बहनों और प्यारे प्यारे बच्चों को समर्पित करना चाहती हूँ ।
खुद को खुद में ढ़ूँढा
उदास, सूनापन मिला..
खुद को बाहर भीड़ में ढ़ूँढा
अजनवी अकेलापन मिला..
जब खुद को ब्लांगर
की दुनिया में देखा, जैसे
सारा जहाँ मिल गया
एक नयी पहचान मिली
जीने का बहाना मिल गया
 ये कहानी  शुरु होती है ,पैतीस साल अध्यापन कार्य करने के बाद ,२००९ में जब मैं सेवानिवृत हुई। मुझे लगा ,मेरा जीवन कहीं रुक सा गया है ,मैं जैसे गति हीन होगई हूँ। मेरे पास करने को कुछ नया नहीं था । मुझे लगता था मैं अपनी पहचान खोने लगी हूँ । यही सब सोच- सोच मुझे डिप्रेशन सा होने लगा था।
तभी अचानक एक दिन गुगुल सर्च करते- करते एक हिन्दी ब्लांग में जा पहुँची । मुझे मालूम था कि कुछ लोग ब्लांग लिखा करते हैं, पर इस के बारे में कोई अधिक जानकारी नहीं थी । मुझे लगा… बस मुझे रास्ता मिल गया मुझे मेरी मंजिल मिल गई ।  
फिर डरते-डरते मैंने दिनांक ४.अप्रेल २०११ को अपना एक ब्लांग खोल ही दिया।सब् से पहले माँ सरस्वती का एक सुन्दर सा चित्र लगा कर मैंने प्रथम पोस्ट का श्रीगणेश  किया ।उसी दिन फिर एक लघु कविता ऋतुराज बसन्त” की दूसरी पोस्ट भी पब्लिश कर दी। ब्लांग का ये अनुभव मेरे लिए जितना रोमांचकारी था उतना ही अनजाना और अनविग्य भी ।
दो दिन बाद दिनांक ६अप्रेल २०११ को सबसे पहली टिप्पणी निशान्त मिश्रा जी द्वारा मिली ।जो मेरे लिये प्रेरणा का बहुत बड़ा श्रोत बन गया। दूसरी टिप्पणी दिनांक ८अप्रेल २०११को राजेन्द्र स्वर्णकार जी द्वारा मिली । ये दोनों ही टिप्पणियाँ मेरे लिए प्रसाद स्वरुप थीं । 
इन्हीं दो टिप्पणियों के माध्यम से मैं इनके ब्लांग में,और इनके ब्लांग से अन्य सथियों के ब्लांग का भ्रमण करने लगी । भ्रमण करते हुए मुझे बहुत सी नयी नयी जानकारियाँ मिलती रही और मैं आप सभी के स्नेह और प्यार का दामन पकड़े आगे बढ़ती रही ।आज दस प्रविष्ठियों में ८५  टिप्पणियाँ हैं, जो मेरे पोस्ट की शोभा ही नहीं, बल्कि मेरी हिम्मत और हौसला भी बढ़ा रही हैं ।
    मैं बहुत से भाई बहनों तथा बच्चों के ब्लांग्स को फौलो करती हूँ ।लेख ,संस्मरण, कविताएँ, गीत ,गज़ल, हास्य-व्यंग और बच्चों की मीठी-मीठी बातों के बीच जब मैं अपने को पाती हूँ तो लगता है,जीवन सार्थक होगया ।
    ये सफर कितना और कब तक चलता रहेगा ये वक्त ही बताएगा ,किन्तु आप सभी का सुझाव, स्नेह और शुभकामनाओ की मुझे हमेशा आवश्यकता रहेगी …….एक बार फिर धन्यवाद………………