abhivainjana


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Friday, 17 January 2014

अकेलापन

 अकेलापन

खिड़की से झांकता

एक उदास चेहरा

और, दूर खड़ा

पत्ता विहीन ,

ढ़ूँढ़ सा, एक पेड़

दोनों ही

अपने अकेलेपन

का दर्द बाँटते

 और

घंटों बतियाते



***********

महेश्वरी कनेरी

21 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-01-2014) को "सत्य कहना-सत्य मानना" (चर्चा मंच-1496) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. आभार शास्त्री ' जी आप का..

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  2. बहुत मर्मस्पर्शी रचना...

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  3. हृदयस्पर्शी रचना ....!!

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  4. मन को छूती रचना |
    आशा

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  5. ढ़ूँढ़ सा, एक पेड़

    दोनों ही

    अपने अकेलेपन

    का दर्द बाँटते

    और

    घंटों बतियाते

    ...............बहुत मर्मस्पर्शी रचना !!

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  6. बढ़िया है दीदी-
    आभार आपका-

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  7. एकांत की पीड़ा को व्यक्त करती पंक्तियाँ

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  8. उफ़
    इस उदासी को कोई समझ भी पाए तो वो भी बहुत है
    बहुत खूबसूरत रचना मैम
    मनन को छूती हुई..

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  9. बहुत गहन और सुन्दर |

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  10. बेहद गहन व सार्थक प्रस्तुति।।।

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  11. अकेलापन बातें करता है खुद से
    क्योंकि खुद को समझता है

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  12. अकेलापन बातें करता है खुद से
    क्योंकि खुद को समझता है

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  13. पीड़ा के जाने कितने रूप ..... मन को अछूती रचना

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  14. बहुत सुंदर .......

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  15. कड़वा सच ......पर है तो सच ही

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  16. दिल को छू लेनेवाली रचना...
    बहुत बेहतरीन...
    http://mauryareena.blogspot.in/

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