abhivainjana


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Saturday, 17 September 2011

अलविदा

अलविदा
एक शाख ज़ोर-जो़र से
हवा में
हाथ हिला रही थी
पता नहीं
पास बुला रही थी
या फिर
अलविदा कह रही थी
दूसरे दिन देखा.
वो शाख वहाँ  नहीं थी
शोर सुन बाहर आई
देखा….
मौहल्ले के कुछ शरारती बच्चें
उसे घसीटते लिए जा रहे थे
मैं देखती रही..
सिर्फ देखती रही……..
******************

36 comments:

  1. कम और बहुत ही सरल शब्दों मे बहुत ही गहरी बात काही है आपने। ये शाख अपने मूल रूप मे पेड़ों को कटने से बचाने का संदेश देती हैं; वहीं बन चुके रिश्तों को दरकने नहीं देने का सार्थक संदेश भी देती है।

    सादर

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  2. मर्मांतक काव्याभिव्यक्ति है।

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  3. बहुत गहरी बात कह दी आपने ...बहुत अच्छा !

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  4. अभिव्यक्ति का गला घोंट दिया शैतान बच्चों ने।

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  5. बहुत सार्थक और सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  6. सार्थकता का सन्देश देती सुन्दर और कोमल कविता

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  7. ओह! क्या से क्या हो जाता है और हम मूक दर्शक बने रह जाते हैं।

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  9. आस पास के दृश्यों से संवेदनशील मन ही प्रभावित होता है ..सुन्दर प्रस्तुति

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  10. सुन्दर अभिव्यक्ति.....:)

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  11. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

    आपको हमारी ओर से

    सादर बधाई ||

    असमय विदा हुई जो डाली-
    गहरा असर हृदय पर डाली |
    फिर भी यह संतोष कीजिये-
    वृक्ष पे पड़ी नजर न काली ||

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  12. hum sabko sandesh deti rachna...............

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  13. बेजोड़ रचना ...गहन अभिव्यक्ति

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  14. शब्द संयोजन छोटी घटना को भी इतनी सुन्दर तरीके से प्रस्तुत कर सकता है पहली बार देख रहा हूँ.

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  15. बहुत बढ़िया। हमें यह याद रखना चाहिए कि जब कोई नहीं होता तो वृक्ष
    ही साथी होते हैं।

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  16. बहुत खूब, मूक की पीड़ा को आपने शब्द दे दिए।

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  17. बालाघाट के शायर राही साहब की पंक्तियाँ याद आ गईं ,प्रासंगिक हैं-
    काटने वाले दरख्तों के न पहचाने गए
    और सजा पा गये ,तीलियाँ ढोने वाले.

    आपकी मूक पीड़ा समूची सृष्टि की पीड़ा है.

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  18. सुन्दर....
    गुलज़ार साहब की नज़्म आ याद आगई...
    "....अलविदा कह रही थी
    या पास बुला रही थी..."
    सार्थक संकेत/सन्देश
    सादर बधाई...

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  19. कभी -कभी इस तरह की घटनाओं से मन व्यथित हो जाता है .......सार्थक रचना

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  20. पास बुला रही थी
    या फिर
    अलविदा कह रही थी
    बेहद खूबसूरत....

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  21. सुन्दर अभिवयक्ति....

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  22. अत्यंत संवेदनशील रचना. अपनों से जुदा होने का दर्द वह शाख ही समझ सकती है.

    बधाई सुंदर प्रस्तुति के लिए.

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  23. रिश्ते भी तो ऐसे ही हैं .शाख से टूटते रहतें हैं गुंचे .

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  24. प्रभावशाली कथ्य, कई बार हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते...

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  25. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम है इस अभिव्‍यक्ति ...भावमय करती प्रस्‍तुति ।

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  26. सभी मित्र बंधुओ को बहुत-बहुत धन्यवाद..मेरी भावनाओ को सहारा देने के लिए.. आशा है आगे भी आपके उत्साह बढ़ानेवाले सन्देश मेरी रचनाओं को मिलता रहेगा /आभार /

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  27. दिल को छू गयी आपकी ये रचना , आपकी संवेदनशीलता का परिचय देती हुई एक खूबसूरत रचना । धन्यवाद।

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  28. mujhe yakeen nahi hai ki main iski chhipi bhaavna ko samajh paay ahoon..mujhe nahi lagta wo sharati bacche gunehgaar honge...shaakh unse kaate ya todi to nahi gayi hogi..kisi aur ka, ya mausam ka kaam hoga....kuch confuse sa hoon padhke..


    Mere latest post ko yahan padhe:
    http://teri-galatfahmi.blogspot.com/2011/09/blog-post_19.html

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  29. चित्र लाजवाब है!
    अभिव्यक्ति हृदयस्पर्शी है।

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  30. कभी -कभी इस तरह की घटनाओं से मन दुखी हो जाता है और ज्यादा दुःख तब होता है जब हम कुछ नहीं कर पाते .......सार्थक रचना

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  31. भावनाओ का बहुत संवेदनशील चिंतन ...

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  32. शाख के माध्यम दे दर्द उकेर दिया आपने ...

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