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Monday, 10 November 2014

गाय माता


      गाय माता 
   (भुजंगप्रयात छन्द )

  गले से लगा बाँटते प्यार देखा

जुबा मौन है बोलते भाव देखा

यही भक्ति आस्था यही धर्म माना

यही प्रीत प्यारी यही छाँव जाना



बड़े प्यार से दूध माँ तू पिलाती

तभी गाय माता सदा तू कहाती

दही दूध तेरा सभी को लुभावे

अभागा वही है इसे जो न पावे



नहीं माँगती सिर्फ देती सभी को

नहीं दर्द माँ बाँटती है किसी को

झुका शीश आशीष को माँ दया दे

रहूँ पूजता माँ सदा ये दुवा दे

******

महेश्वरी कनेरी

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर,,,,,
    माँ से सुन्दर और होगा भी क्या !!

    सादर
    अनु

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  2. बेहद खुबसूरत रचना

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  3. सचमुच माँ की तरह गाय मानव को पालना देती है..गौ को माता ऐसे ही तो नहीं कहा जाता है...

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-11-2014) को "नानक दुखिया सब संसारा ,सुखिया सोई जो नाम अधारा " चर्चामंच-1795 पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. बहुत बहुत आभार आप का...

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  5. नहीं माँगती सिर्फ देती सभी को
    नहीं दर्द माँ बाँटती है किसी को
    झुका शीश आशीष को माँ दया दे
    रहूँ पूजता माँ सदा ये दुवा दे
    ...बहुत सुन्दर ..

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  6. बहुत ही बढिया .....

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  7. भावपूर्ण ..
    तभी तो पूजते हैं गाय माता को ...

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  8. सुन्दर रचना ! भावपूर्ण

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