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Friday, 19 September 2014

अटूट बंधन









 अटूट बंधन

कल रात भर आसमान रोता रहा

धरती के कंधे पर सिर रख कर

 इतना फूट फूट कर रोया कि

 धरती का तन मन

सब भीग गया

पेड़ पौधे और पत्ते भी

इसके साक्षी बने

उसके दर्द का एक एक कतरा

कभी पेडो़ं से कभी पत्तों में से

टप-टप धरती पर गिरता रहा

धरती भी जतन से उन्हें

समेटती रही,सहेजती रही

और..

दर्द बाँट्ने की कोशिश करती रही

ताकि उसे कुछ राहत मिल जाए


**********************

महेश्वरी कनेरी

22 comments:

  1. सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  2. आपकी लिखी रचना शनिवार 20 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    Replies
    1. आभार यशोदा जी आप का..

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  3. दर्द बाँटकर हल्का होता है और कभी-कभी सच्चा हमदर्द भी मिल जाता है । सुन्दर

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  6. dhara -gagan ka rishta atut hai , sambhal lete hain ek duje ko ...

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  7. बहुत सुन्दर....

    सादर
    अनु

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  8. वाह बहुत सुन्दर

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  9. बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण !

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  10. बहुत सुंदर मन के भाव ..

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  11. भावों का सुंदर संयोजन !

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  12. आसमान और धरती के बहाने जीवन की कथा व्यथा...

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  13. बढ़िया रचना सुन्दर शब्द पिरो कर बनाई है आपने |

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  14. अच्छी भावपूर्ण रचना !
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

    राज चौहान
    http://rajkumarchuhan.blogspot.in

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  15. मार्मिक ,
    मंगलकामनाएं आपको !!

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  16. अनुपम प्रस्तुति....आपको और समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं

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  17. एक दूसरे का दर्द बाँटना, समझना यही तो प्रकृति है
    काश ! हर मनुष्य यह समझ सके
    सादर !

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  18. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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