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Friday, 11 April 2014

कुछ अनोखे पल

     
 झुक कर आसमां जब

  धरती के कंधे पर सर रख देता है
  हौले से तब धरती थपथपा कर
  उसे थाम लेती है
अनोखा मिलन




 पहाड़ों की गोद से निकल
 चट्टानों को चीर,बेसुध  सी नदी
 दौड़ती हुई सागर की बांहो में
 सिमट जाती है
 अनोखा प्रेम…….




भोर की किरणों के आते ही
कलियाँ खिल उठतीं हैं
फूल मुस्काने लगते हैं
पेडों पर नई
कोंपलें फूटने लगतीं हैं
अनोखा लगाव……




माँ की छाती से चिपक
तृप्त हो मुस्का के
जब वो पहली बार
माँ कहता है..तब माँ
धन्य होजाती है
अनोखा अहसास….

  महेश्वरी कनेरी

20 comments:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 12/04/2014 को "जंगली धूप" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1580 पर.

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    1. आभार राजीव जी।

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  2. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

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  3. इसीलिये तो जीवन सुन्दर है !

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  4. संबंधों का सुंदर विवरण. सुंदर रचना.

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  5. संबंधों की प्रगाढ़ता का सुन्दर चिंत्रण देखने को मिला .. . बहुत सुन्दर रचना .

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  6. अनोखा है यह भाव भी..

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  7. bahut hi sundar chitra aur rachna...

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  8. सब अनोखा... बहुत सुन्दर भाव व चित्र. बधाई.

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  9. बहुत सुन्दर भावभरी चित्रमय रचना है !

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  10. सबसे बड़ा सुख और तृप्ति . . . . . .

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  11. सुन्दर चिंत्रण देखने को मिला .

    Recent Post शब्दों की मुस्कराहट पर ….अब आंगन में फुदकती गौरैया नजर नहीं आती

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  12. बहुत सुन्दर चित्रण । संग्रहनीय रचना । सादर आभार।

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