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Saturday, 27 April 2013

माँ का आंचल


   माँ का आंचल 
आज माँ का आंचल 
डरा सा सहमा क्यों है ?
देकर जन्म बेटी को 
 पछताया सा क्यों है ?

प्यार दिया, दुलार दिया 
दी ममता  की छांव सघन 
पर देन सके बेटी को 
सुरक्षित एक आंगन 

एक अनजाना सा डर 
हर पल सांस अटकती  है 
 जब भी बेटी घर से 
बाहर निकलती है 

बेखौफ से घूम रहे हैं 
 ये दरिन्दे कौन हैं ?
अस्मिता  लुट रही बेटी की
क्यों कानून  यूं  मौन हैं ?

*****************
महेश्वरी कनेरी 


 [K1]

43 comments:

  1. आज की बेटी सुरक्षा मांगती है,प्यार और दुलारा मांगती है ...तभी ये डर दूर होगा

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  2. माँ का आंचल
    आज माँ का आंचल
    डरा सा सहमा क्यों है ?
    देकर जन्म बेटी को
    पछताया सा क्यों है ?
    मार्मिक अभिव्यक्ति....
    सादर

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  3. बहुत मार्मिक प्रस्तुति...यही आशा है कि हालात बदलें...

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  4. अस्मिता लुट रही बेटी की
    क्यों कानून यूं मौन हैं ?

    सार्थक प्रश्न .......चिंतनीय हालात हैं ...क्या कहा जाये ...????

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  5. It's really very unfortunate to see the condition of women in our society.

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  6. दुखद परिस्थितियां हैं ..... सटीक संवेदनशील चित्रण

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  7. माँ का हृदय तो बच्चों के हर संभावित कष्ट में धड़क जाता है।

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  8. हर माँ आज चिंतित है कब हमारी बेटियां सुरक्षित और स्वतंत्र हो पाएंगी .......बहुत सुन्दर चित्रण

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  9. बहुत उम्दा संवेदनशील सटीक प्रस्तुति !!!

    Recent post: तुम्हारा चेहरा ,

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  10. ये बड़ा सवाल है...
    और सब अनुत्तरित हैं...
    हृदयस्पर्शी रचना
    सादर
    अनु

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  11. माँ से ऊपर दुनिया में कोई नहीं और माँ के आँचल की छाँव से आराम तलब जगह और कहीं नहीं |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  12. प्यार दिया, दुलार दिया
    दी ममता की छांव सघन
    पर देन सके बेटी को
    सुरक्षित एक आंगन --------
    आँगन तो सुरक्षित है पर दरिंदों की नजर लगी है
    वर्तमान की गहन अनुभूति
    बधाई
    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों

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  13. बहुत सुंदर संवेदनशील... प्रस्तुति

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  14. गहन सम्वेदानाओं से भरी रचना |
    बढ़िया है |
    आशा

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  15. सामयिक परिवेश को रेखांकित करती सशक्त रचना....

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  16. Sach kaha kahan de pa rahe hain hum beti ko surakshit angan.

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  17. बेखौफ से घूम रहे हैं
    ये दरिन्दे कौन हैं ?
    अस्मिता लुट रही बेटी की
    क्यों कानून यूं मौन हैं ?

    पता नहीं यह भय कब दूर होगा. सामयिक प्रस्तुति.

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  18. वर्तमान का प्रतिबिंब कविता में है। अंत में जाकर 'मौन' पर आकर कविता ठहरती और सबके सामने एक जलता सवाल छोडती है।

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  19. बहुत ही बढ़िया आंटी


    सादर

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  20. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 29/04/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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    Replies
    1. धन्यवाद!यशवंत..

      Delete
  21. बस एक दर्द..दर्द..दर्द..

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  22. एक अनजाना सा डर
    हर पल सांस अटकती है
    जब भी बेटी घर से
    बाहर निकलती है ,....
    वर्तमान हालातों के मद्देनजर बहुत सटीक रचना ।

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  23. h दिगम्बर नासवा has left a new comment on my post "माँ का आंचल":

    गहरे दुख की बात है ... ओर इसका जवाब समाज को छोड़ के किसी के पास नहीं ...

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  24. हर माँ के मन के डर को आपने सुन्दरता से प्रस्तुत किया .हर माँ चाहती है अपनी बेटी की सुरक्षा उन अनजान दरिंदों से.
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest postजीवन संध्या
    latest post परम्परा

    ReplyDelete
  25. सचमुच चिंतनीय स्थिति ...
    संवेदनशील रचना
    सादर!

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  26. एक अनजाना सा डर
    हर पल सांस अटकती है
    जब भी बेटी घर से
    बाहर निकलती है

    संवेदनशील रचना

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  27. bahut hi anishchit sa mahol bn raha hai ...kanun ke rakhwale apna ghar bharne me lage hain ....marmik prastuti ....

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  28. अपने ही घर में अपनों से सुरक्षा... बहुत कठिन सवाल है, मुश्किल है हल लेकिन असंभव नहीं...

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  29. माँ का आँचल..
    वर्तमान समय में माँ की संवेदनाओ को व्यक्त करती प्रस्तुति.

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  30. इसी का उत्तर तो ढूंढ रहे हैं हम सभी आज कल ,बहुत सुन्दर प्रस्तुति हार्दिक बधाई महेश्वरी जी

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  31. उपासना सियाग has left a new comment on post "माँ का आंचल":

    डर तो है लेकिन हिम्मत भी जगानी पड़ेगी ही ...बहुत बढ़िया जी

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  32. बेटी का जन्म और भय का जन्म - एक सा है

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  33. आज हर जुबां पर बस यही सवाल है .....मार्मिक प्रस्तुति

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  34. सतीश सक्सेना has left a new comment on post "माँ का आंचल":

    माँ अगर डरने लगी ,
    समझो प्रलय नज़दीक है !

    शुभकामनायें आपको !

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  35. वातमान हालातों पर सार्थक अभिव्यक्ति जब तक हमारे देश में बेटे और बेटी का अनुपात समान नहीं हो जाता और लोग के दिलों में कानून का डर नहीं आ जाता तब तक शायद इस समस्या का कोई निदान हो।

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  36. बहुत ही मर्म स्पर्शी एवं सामयिक रचना.

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  37. हालात बेकाबू होते जा रहे हैं ...यहाँ असं में ही नित न जाने कितनी घटनाएं सुनने में आ रही हैं .....
    अब कलम से काम न चलेगा .....

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  38. हालातों के साये में माँ बस फिक्रमन्‍द है ..
    मन को छूती पोस्‍ट
    सादर

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  39. लोग बेटियों को सिर्फ घर की इज्ज़त क्यूँ समझते हैं देश की इज्ज़त क्यूँ नहीं समझते ?
    एक अनजाना सा डर
    हर पल सांस अटकती है
    जब भी बेटी घर से
    बाहर निकलती है
    अपने ही घर में हमारी बेटियां असुरक्षित हैं |
    शर्म की बात है मित्र पर है

    http:/www.utkarshita.blogspot.com
    http:/tumhareeyadein.blogspot.com

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  40. आज के जो हालात हैं उनसे डर तो लगता ही है ॥ सार्थक रचना

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