abhivainjana


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Friday, 6 May 2011

ये कैसी भूख है ?


ये कैसी भूख है  ?

किसी को फूट्पाथ में भी
गहरी नींद सोते देखा,
किसी को नरम गद्दों पर 
करवट बदलते देखा ।
किसी को पेट में भूख लगती है
किसी की आँखों में भूख दिखती है।
किसी को रोटी की भूख ,
किसी को दौलत की ।
रोटी की भूख तो
खाकर मिट जाती है,
लेकिन दौलत की भूख ,
बढ़ती ही जाती है ।
किसी को चिथड़ो में भी
इज्जत  छिपाते देखा ,
किसी को,चंद सिक्कों के लिए
सरे आम होते देखा  
किसी को आन पर
 मरते देखा
किसी का ईमान
 बिकते  देखा।  
लोगों को तिल- तिल
मरते, और मारते देखा ।
मत पूछो यहाँ,
क्या-क्या देखा ?
हर पल इंसानों को,
 कैसे-कैसे
भूख से जूझते देखा |
    -------------

32 comments:

  1. मार्मिक ...... हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ

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  2. किसी को चिथड़ो में भी
    इज्जत छिपाते देखा ,
    किसी को,चंद सिक्कों के लिए
    सरे आम होते देखा
    आज के समाज की मानसिकता का सही विश्लेषण,उत्तर विहीन प्रश्नों का एक अम्बार, निसहाय मानव, सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई.... आपके ब्लाग पर पहली बार आना हुआ मलाल रहेगा ..

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  3. बेहतरीन अभिव्यक्ति!

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  4. आज के परिप्रेक्ष्य में सार्थक रचना। आभार।

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  5. ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. साथ ही धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
    इस ब्लॉग पर आने से हिंदुत्व का विरोध करने वाले कट्टर मुसलमान और धर्मनिरपेक्ष { कायर} हिन्दू भी परहेज करे.
    समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
    .
    जानिए क्या है धर्मनिरपेक्षता
    हल्ला बोल के नियम व् शर्तें

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  6. aapki chinta jayaj hai , honi bhi chahiye ,
    dhanyavad .

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  7. बहुत गहरी छाप छोडती रचना |बधाई |कभी मेरे ब्लॉग पर भी आएं |
    आशा

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  8. bahut hi marmik abhibaykti...sach ko ujagar karti sambedansil rachna

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  9. बहुत सही और गहरी बात कही आपने.

    सादर

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  10. लोगों को तिल- तिल
    मरते, और मारते देखा ।
    मत पूछो यहाँ,
    क्या-क्या देखा ?
    हर पल इंसानों को,
    कैसे-कैसे
    भूख से जूझते देखा |
    ..सच इस पेट के लिए इंसान क्या क्या नहीं कर जाता!
    बहुत बढ़िया चिंतनशील प्रस्तुति के लिया आभार

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  11. Its our hunger for more and more that we forget what is important in our lives.Instead of concentrating on 'having more',lets focus on 'being more'...being more courageous,more campassionate,more loving, more giving...

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  12. मनोभावों को बेहद खूबसूरती से पिरोया है आपने....... हार्दिक बधाई।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है!

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  13. दिल को छु गई ..............किसी को चंद सिक्को पर बिकते देखा ..........किसी का ईमान ...............बहुत खूब .................हृदय से आभार

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  14. आज के परिप्रेक्ष्य में सार्थक रचना। आभार।

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  15. सुंदर कविता आपको बधाई और शुभकामनाएं |

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  16. किसी को रोटी की भूख ,
    किसी को दौलत की ।
    रोटी की भूख तो
    खाकर मिट जाती है,
    लेकिन दौलत की भूख ,
    बढ़ती ही जाती है ।

    बहुत सही कहा है आपने ...।

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  17. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 10 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  18. किसी को फूट्पाथ में भी
    गहरी नींद सोते देखा,
    किसी को नरम गद्दों पर
    करवट बदलते देखा ।
    .... नरम गद्दों पैर अक्सर आँखें नींद को तरसती हैं , नींद आँखों की भूख के पास नहीं आती - बहुत ही अच्छी रचना

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  19. apni jaruraton ke hisab se bhook ki paribhasha badal jati he! aapne bahut hi achhe dhang se is bat ko rakha!
    badhai kabule!

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  20. बहुत संवेदनशील रचना..आज के यथार्थ को बहुत सटीकता से उकेरा है..बहुत सुन्दर

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  21. इस देश के करोड़ों लोग भूख से मरते हैं लेकिन परिश्रम नहीं करते। यदि ऐसे लोग थोड़ा भी कार्य करेंगे तो कम से कम भूख से तो नहीं मरेंगे। आपने चित्र अच्‍छा उकेरा है।

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  22. सुंदर रचना और लाजवाब प्रस्तुति
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  23. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 16-02-2012 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज...हम भी गुजरे जमाने हुये .

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  24. हर पल इंसानों को,
    कैसे-कैसे
    भूख से जूझते देखा |very nice post.

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  25. बेहद मर्मस्पर्शी रचना..
    आपकी लेखनी को मेरा नमन..

    सादर.

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  26. संवेदनशील अंतर्स्पर्शी रचना....
    सादर.

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  27. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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