abhivainjana


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Tuesday, 26 November 2013

सुबह का अहसास



ढूँढ़ रही मैं,

बीते वक्त के, उस कल को

छोड़ आई ,जहाँ पर

बचपन के उस पल को

हर दिन मैं बढ़ती जाती

उम्र की सीढ़ी चढ़ती जाती

और छूट रहा था बचपन पीछे

बचपन-बचपन कह पुकारती

पर पास कभी न वो आती

बस दूर खड़ी-खड़ी मुस्काती

जब मैं नन्हें हाथों से अपने

माँ की अँगुली थामे रहती

तब अकसर सोचा करती थी..

कब जल्दी बड़ी होजाऊँ

पर आज..

 बडी होकर भी मैं

वापस बचपन ढूँढ़ा करती हूँ

उम्र की ढलती इस संध्या में

यादों का दीया जला कर

मैं पगली ..

सुबह का अहसास संजोए रखती हूँ


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महेश्वरी कनेरी

Wednesday, 16 October 2013

पत्थर का शहर



तुम्हें याद है न..

कभी तुम्हारे अंदर एक गाँव बसा करता था

लहलहाते खेतों की ताज़गी लिए

भोला भाला,सीधा साधा सा गाँव

और उसी गाँव में मेरा भी घर हुआ करता था

मिट्टी से लिपा हुआ भीनी भीनी खुशबू लिए

सुखद अहसासों से भरा,चन्द सपने बटोरे

एक छोटा सा प्यारा घर

पर तुम ने ये क्या किया

प्यार के इस लहलहाते खेत को

पकने से पहले ही उजाड़ दिया

और वहाँ एक शहर बसा लिया

अब तो मेरा घर भी घर न रहा

पत्थर का मकान बन गया

मुट्ठी भर सपने और वो सुखद अहसास

उसी पत्थर के नीचे कही दब कर सो गए

और मैं बेघर हो ,भटक रही हूँ

तुम्हारे इस पत्थर के शहर में..


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महेश्वरी कनेरी

Friday, 11 October 2013

उठो नव निर्माण करो



उठो नव  निर्माण करो

मौत का था तांडव ऐसा

आज भी…

ज़र्रा-ज़र्रा काँप रहा

मातम सी खामोशी है

सहमी-सहमी सी घाटी है

जो मर गए ,वो तर गए

जीवित जो निष्प्राण ,

ठगे हुए से खड़े हैं

माना कि दर्द बहुत है

पर कब तक शोक मनाना है

समेट लो दर्द को अपने,

 और उठो….

भाग्य को फिर जगाना है

बुझ गए थे ,चूल्हे जो

उन्हें फिर जलाना है

यूँ रोने से क्या होगा ?

तुम जिन्दा हो

खुद पर विश्वास करो

नव सृजक बन ,प्राण भरो

उठो नव निर्माण करो

तिनका-तिनका चुन कर

फिर घर बसाना है

मरघट को जिन्दा कर,

धरती को सजाना है

तुम शिव हो,तुम ही शक्ति

खुद को पहचानो

जो खोया है,फिर पाओगे

थोडा धीर धरो

नव सृजक बन प्राण भरो

उठो, नव निर्माण करो

नव निर्माण करो…

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महेश्वरी कनेरी

Tuesday, 8 October 2013

विदा कर दिया मैंने


विदा कर दिया मैंने

कल मैंने,

सजा कर, सँवार कर

पूरे रीति रिवाजों के संग

अपनी कविता “सरस अनुभूति” को

लोकार्पित कर दिया….

ताकि बाहर की दुनिया को

वो जान सके, समझ सके

और अपनी पहचान बना सके ।

बड़े नाजों से पाला था 

नेक संस्कारों में भी ढाला था

और कब तक सहेजती मैं

एक दिन तो जाना ही था उसे

समाज के प्रति उठे मनोभाव को

समाज को ही समर्पित कर दिया

पर कभी सोचती हूँ ..

दुनिया की इस भीड़ में

कहीं खो न जाए

इसी लिए हिम्मत देती रहती 

“नाहक थपेड़ों से मत घबराना


निर्मल झरने की तरह

निरंतर बहती रहना

जितना तपोगी उतना ही निखरोगी

तुम्हें और सबल ,सरस बनना है

ताकि जन-जन के हदय में

अनवरत बह सको”

यही शुभकामनाओं के साथ

विदा कर दिया मैंने

अपनी लाडली “सरस अनुभूति” को..


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महेश्वरी कनेरी

Monday, 30 September 2013

एक सुखद यादगार

लोकार्पण 
                एक सुखद यादगार

जिन्दगी में कुछ पल ऐसे आते हैं जो एक सुखद यादगार बन अकसर मन को गुदगुदाने लगते हैं । ऐसा ही सुखद पल २२ सितम्बर को मेरे जीवन में भी आया ,जब मैंने अपनी पुस्तक “सरस अनुभूति” का लोकार्पण किया था। मेरे अनुभव की किताब में एक और पन्ना जुड़ रहा था, ये बात खुशी की है,मैं जानती थी ,पर ये नही जानती थी कि ये पल मुझे इतना आत्म विभोर कर जाएगा कि जिसे मैं कभी भूला नहीं पाऊँगी ।
    सभागार में उपस्थित सभी मित्रबंधु शुभचिन्तक, नए पुराने साथियों को देख मेरा मन गद्गद हो उठा । पुराने साथियों में मेरे तीस पैतीस साल पुराने साथी भी सम्मिलित थे ।सबसे सुखद आश्चर्य तो तब हुआ जब कार्य क्रम के अंत में किसी ने मुझ से आकर कहा “बहुत बहुत बधाई महेश्वरी जी” मै  उन तीन विभूतियों को देखती रही चेहरा तो कुछ जाना पहचाना लगा पर समझ नहीं पारही थी ।उन्होंने फिर कहा “आभासी दुनिया के मित्र” । बस मैं समझ गई.. राजेश कुमारी जी, नूतन गैरोला जी और कल्पना.जी.जिनसे मैं पहली बार मिल रही थी। वो पल मेरे लिए कितना सुखद आश्चर्य से भरा हुआ था कि मैं शब्दों में बया ही नहीं कर सकती, सिर्फ महसूस ही कर सकती हूँ ।

 राजेश कुमारी जी, नूतन गैरोला जी कल्पना.जी.


कार्य क्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ जिसे मेरी बेटी स्वाति ने प्रस्तुत किया तद्पश्चात गणेश स्तुति मेरी पोती काशवी ने नृत्य द्वारा प्रस्तुत किया । पुस्तक के लोकार्पण के बाद मेरी ही पुस्तक से एक कविता “कुछ सांस बची है जीने को आज मुझे जी भर जीने दो “को स्वरवद्ध कर स्वाति ने गाकर प्रस्तुत किया ।

 पोती काशवी 
बेटी स्वाति

    ईश्वर की अनुकंपा और सभी साथियों के सहयोग से मेरी पुस्तक “सरस अनुभूति” का लोकार्पण बहुत ही गरिमा पूर्वक संपन्न हुआ।.मेरा ये मानना है कि.मेरी पुस्तक “सरस अनुभूति” का जन्म स्थल ब्लांग जगत ही है जहाँ पल पल मेरी भावनाओ को नया अहसास मिलता रहा और मैं उन्हें शब्दों में पिरोती रही इसी बीच कब मेरी “सरस अनुभूति” का जन्म भी हो गया मुझ पता भी न चला।
   मैं अपने ब्लांग जगत के सभी साथियों की ह्रदय से आभारी हूँ जिन्होंने समय समय पर मेरे ब्लांग पर आकर टिप्पणियों द्वारा शुभकामनाओं द्वारा मुझे उत्साहित करते रहे और मेरे मनोबल को बढ़ाते रहे ।बहुत बहुत धन्यवाद ।
 शुभकामनाओ सहित

महेश्वरी कनेरी