abhivainjana


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Tuesday, 22 January 2013

ये दिन

ये दिन



रोज 
सुनहरी किरणों के संग आता है दिन

ढलते सूरज के संग गुजर जाता है दिन

रोज नई तारीखों को ले लाता है दिन

मुट्ठी में रेत सा फिसल जाता है दिन

आँखों में कल के सपने सजाता है दिन

वर्तमान में अतीत के पन्ने पलटता है दिन

मुश्किल घड़ियों में थम जाता है दिन

व्यस्थता में पंक्षी सा उड़ जाता है दिन

पल-पल नया इतिहास रच जाता है दिन

कर्मठ जनों का संकल्प बन जाता है दिन

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महेश्वरी कनेरी

Tuesday, 15 January 2013

ज्वाला बनकर दमको




इस तरह, घुटनो में सर छुपाकर

आँखो से आँसू बहा कर

क्या होगा..?

उठो ! बदल डालो अपनी इस छबि को

बन कर दुर्गा काली

संघर्ष का तुम बिगुल बजादो

उठा लो, हाथों में हौसलों का तलवार

और करो दुराचारियों का संहार

फिर कभी कोई दुष्कर्म का साहस न कर सके

कर दो नष्ट इस रक्त बीज को

फिर कभी कोई दुर्भाव न पनप सके

तुम एक शक्ति हो,खुद को पहचानो

ज्वाला बनकर दमको

भीतर एक आग जगाओ

पड़ने वाले हर कुदृष्टि को

भस्म कर डालो

कोई कृष्ण नहीं आयेगे

खुद को खुद ही बचाना होगा

लेकर हाथों में मशाल

कर लो खुद से एक वादा

बदल डालो इस भ्रष्ट समाज को

जिससे हर स्त्री,निर्भयता से

कही भी आजा सकें

फिर कभी किसी बेटी की

अस्मिता न लूटे

किसी का घर न टूटे

फिर कभी कोई ऐसा

    दर्द भरा हादसा न उभरे

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दिसम्बर में हुए एक शर्मनाक घटना से दुखी मन अभी तक नही उभर नहीं सका है..सरकार का कब तक मुँह देखे ..आज भी हर रोज ऐसे हादसे जगह-जगह पर बेखौफ होरहे है ..अब हमें मिल कर खुद ही कुछ करना होगा.. 

                               महेश्वरी कनेरी

नोट:… कृपया मेरे नए ब्लांग  http://balmankirahe.blogspot.in/  मे भी पधारे ..

 बच्चों के लिए कुछ बाल गीत ..सुने.. आभार

Wednesday, 2 January 2013

स्वागत नव वर्ष




खुशियों का दीप जला कर,

उम्मीदों की झोली फैला कर

करते स्वागत नव वर्ष तुम्हारा

हर्षदायिनी, मंगलमयी, शुभकारिणी

हो हर चरण तुम्हारा

स्वागत-स्वागत नव वर्ष तुम्हारा

हिम्मत देना ,चाहत देना

देना अथाह शक्ति दान

निज स्वार्थ भूला कर,

कर सकूँ जन कल्याण

नव सृजन का बहे नित धारा

स्वागत-स्वागत नव वर्ष तुम्हारा

स्वप्न न रूठे ,उम्मीद न टूटे

 धरा में नित नव चेतन जागे

प्रेरणा बन बहे हर शब्द मेरे

नव रश्मि गीत बन रहे नित आगे

अंधकार हरे राह बने उजियारा

स्वागत-स्वागत नव वर्ष तुम्हारा

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महेश्वरी कनेरी

Tuesday, 18 December 2012

मेरा शहर देहरादून

मेरा शहर देहरादून 


विकास के नाम पर ये क्या होगया है
देखो ! मेरा शहर कही खो गया है
हरी भरी वादियों में खिलता था दून कभी
आज हवा ने भी रुख बदल लिया है
कभी सड़कों के दोनों किना्रो पर
सजा करती थी पेड़ो की सघन कतारें
आज उदास पड़ी हैं सड़के,
अपनी सूनी बांह पसारे
अब न बाग बचे न  बगीचे
बस कुछ पेड़ सहमे से खड़े हुए है
कब आजाए उनकी भी बारी
अब तो यहाँ मौसम भी बदल गया है
कभी चिड़ियों के कलरव से, दून जगा करता था
आज मोटरों के शोर ने नींद ही उड़ा दी है    
कभी पैदल चल कर ही हाट-बजार किया करते थे
आज दो कदम भी चलना दुश्वार होगया है
महा नगरों की कुरीतियो और शहरीकरण की इस
अंधी दौड़ ने मेरे दून की आत्मा को ही कुचल डाला है
हर तरफ शोर और अजनवी चेहरो की भीड़
इंसानों का नही, मुखौटो का शहर बन गया है
बासमती और लीची शान हुआ करती थी दून की कभी
आज मौसम की तरह ये भी कही खो गये हैं
बस बची है तो कुछ यादें और एक घण्टा घर
जिसने दून को आज भी जीवित रखा हुआ है…
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महेश्वरी कनेरी  

Monday, 12 November 2012

मिलकर मनाएं चलो दिवाली





मिलकर मनाएं चलो दिवाली
रह जाए न देखो ,कोई कोना खाली
घर –घर दीपों की झड़ी लगादें
मिलकर मनाएं चलो दिवाली……

नव ज्योति के झिलमिल पंखो से
आओ हटा दें हर घर से अँधेरा
करें जगमग आस किरणों को
लाएं फिर एक नया सवेरा
मिलकर मनाएं चलो दिवाली…..

चमक रोशनी की कुछ ऐसी हो
कि राह भटक जाए ‘अंधेरा’
फिर कभी न हो किसी ह्रदय में
उदासी का यूँ गहन बसेरा
मिलकर मनाएं चलो दिवाली....

 मानव के ह्रदय भूमि पर,
जलती रहे सदैव दिव्य प्रकाश
फिर आलैकिक होगा घरती पर
दिव्यता का सघन आभास 
मिलकर मनाएं चलो दिवाली….
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दीपावली की सभी मित्र बंधुओ को हार्दिक 

शुभकामनाएं

 महेश्वरी कनेरी

Saturday, 3 November 2012

मंज़िल तेरी उस पार है



थकना नहीं ,ओ पंछी मेरे
मंज़िल तेरी उस पार है
पंख फैला ,उड़ता चल
हर सांस में विश्वास भर
उड़ते हुए आकाश पर
कैसी थकन कैसी तपन
भूल तन के पीर को
श्रम से किस्मत बदल
बाधाओं से डरना नहीं
राह में रुकना नहीं
चाहे घनेरी रात हो
लक्ष पर रख कर नज़र
तू चल अपनी डगर
चिंता तज ,मत हो विकल
क्यों बहाता नीर रे ?
छल से बुना संसार है
निकल इस जंजाल से
चलना अभी दूर है
थकना नहीं ओ पंछी मेरे
मंज़िल तेरी उस पार है
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महेश्वरी कनेरी

Monday, 22 October 2012

ये वक्त भी बदल जाएगा



खामोश है आज चाँदनी भी
खामोश धरती आसमां है
खामोश हैं तारे सभी
खामोश उनका कारवां है
शाख के हर पात खामोश है
खामोश हुए प्रकृति के हर साज़
हवा भी थक कर सो गई अब
खामोश लहरों के गीत आज
बस,खामोश नहीं मेरे मन का शोर
कुछ बैचैन हैं ,परेशान सा
अनबुझ प्रश्नों का सैलाब लिए
उठता है दिल में बस तूफान 
अब तो खामोश हो जा मन मेरे
ये तूफा़न भी टल जायेगा
कल सूरज के आते ही ,देखना
ये वक्त भी बदल जाएगा
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महेश्वरी कनेरी