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Tuesday, 11 December 2012

दर्द का रिश्ता




  बेटी एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही बहुत से अहसास मन में 
उभरने लगते हैं । कुछ दर्द कुछ ममता कुछ चिन्ता कुछ डर कुछ गर्व….अगर बेटी शादीशुदा है और ससुराल में है,चाहे कितनी भी सुखी और संपन्न क्यों न हो ,फिर भी माँ की ममता का छोर भीगा ही रहता है।जब बेटी पास होती है तब कुछ कहा नही जाता जब दूर चली जाती है तो बहुत कुछ कहने को मन तरसता है ।कितना अनोखा है ये रिश्ता । वैसे सभी रिश्ते ह्रदय से जुड़े होते है पर शायद ये रिश्ता दर्द से जुड़ा हुआ है
कहते हैं बेटी आँख का वो आँसू है जिसे छिपा भी नही सकते,और संजोकर रख भी नही सकते उसे तो बहना ही बहना है ।
   आज समय कुछ बदल रहा है अधिकतर लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी है और कंधे से कंधा मिला कर अपने कार्य क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रही हैं ।आज कई घरों में बेटी बेटा बन अपने बूढे़ माँ बाप और पूरे परिवार की देख भाल भी कर रही है । लेकिन बेटी तो बेटी है उसे विवाह के बाद हर हाल में बाबुल को छोड़ कर जाना ही है ।
   जैसा कि हमारे शास्त्रों के अनुसार विवाह मंडप में माता-पिता अपनी बेटी का कन्या दान कर उसे दान कर देते हैं और दान दी हुई वस्तु पर फिर कोई हक नही रह जाता । इसी लिए बेटी को पराया धन कहा जाता है ।विवाह के बाद बेटी का ससुराल अपना और मायका पराया बन जाता है । और एक मेहमान की तरह ही मायके में उसका आना जाना होता है ।
   कितना अजीब सा लगता है न ! जिस घर में बचपन बीता जिस आँगन में खेली, क्षण भर में ही वो बेगाना बन जाता है।एक ही पल में एक नन्हीं सी जान चिड़िया की तरह कब फुर से उड़ जाती हैं पता ही नहीं चलता बस रह जाती है दर्द भरी यादें । कैसा अद्भुद है ये दर्द का रिश्ता ,जिसे हर बेटी की माँ को सहना पड़ता है शायद……….
         ********************
              महेश्वरी कनेरी

34 comments:

  1. बेटी आँख का वो आँसू है जिसे छिपा भी नही सकते,और संजोकर रख भी नही सकते उसे तो बहना ही बहना है ।

    बहुत उम्दा,लाजबाब भावनात्मक प्रस्तुति....

    recent post: रूप संवारा नहीं,,,

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. बात सच है दी....
    मगर बड़ा दिल दुखाती है...
    जाने कैसे बेटियाँ दान की जाती हैं...जाने कैसे उनका अपना घर पराया हो जाता है...
    उम्मीद है वक्त और भी बदलेगा..

    सादर
    अनु

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (12-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  5. बेटी ही एक ऐसा रिश्ता है जिसे विदा करना समाज की रीत है हाँ आँखें भर जाये तो क्या बात है . यही तो दुनिया की रीत है

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  6. aankhe bhar aayee meri,pr yah kahte bada hi dukh hota ki "har mahine ki pahali tarikh aati hai,aur har bar beti hi farak kyo rah jati hai..."meri bs ek guzaris hai beti ko gr hi ske to riz ek farak nya dije

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  7. बिछड़ने की पीड़ा छिपी है इस रिश्ते में..

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  8. संदीप पवाँर has left a new comment on post "दर्द का रिश्ता":

    बेटी बुढ़ापे में भी माँ-बाप को याद करती है।

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  9. मुझे तो बेटी हुई नहीं ....
    कोई बड़ी-छोटी बहन का अनुभव है नहीं ..........
    लेकिन खुद एक बेटी होने के कारण समझने की कोशिश करती हूँ !!

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  10. dil ko chhoo lene vali abhivyakti..

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  11. मन को छूती रचना है |
    आशा

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  12. सही बात काही आंटी !


    सादर

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  13. अधिकार नहीं कोई कुछ कह लूं सुन लूं ,
    छू लूं समेट लूँ ममता के अंचल में
    कैसी बेबसी अभी तक सिर्फ़ हमीं थे,
    अधिकार हीन हो गये एक ही पल में

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  14. This comment has been removed by the author.

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  15. बहुत सराहनीय प्रस्तुति. आभार. बधाई आपको

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  16. बेटी का रिश्ता संसार में सब रिश्तों से अलग है ... अनोखा ..

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  17. सत्य बात कही है और सत्य तो दुःख भरा ही होता है..

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  18. बहुत मर्मस्पर्शी..लेकिन बेटी पराये घर जा कर भी पराई नहीं हो पाती, हर समय दिल के करीब रहती है..बेटी होना एक वरदान है लेकिन उसका दूर होना एक दर्द...

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  19. विदाई के समय दुःख तो होता है लेकिन बेटी कभी परायी नही हो पाती है!

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  20. बेटी की विदाई का क्षण, मां-बाप के लिए अत्यंत पीड़ादायक।

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  21. बेटी वो खुश्बू है जो घर को महका देती है और दूर भी हो तो उसकी महक बनी रहती है।
    इस भावपूर्ण रचना के लिये आभार।

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  22. सच कहा ये रिश्ता अनुपम है .अंजुरी भर फूलों के जैसा

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  23. एक अनोखा रिश्ता ...हर अहसास को लिए हुए

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  24. पर दिल में बसी रहती हैं बेटियाँ..

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  25. बेटी आँख का वो आँसू है जिसे छिपा भी नही सकते,और संजोकर रख भी नही सकते उसे तो बहना ही बहना है .... मन को छूते हुये शब्‍द
    अनुपम प्रस्‍तुति

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  26. सहेजने के काबिल पोस्ट |

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  27. पहले इस नंदन कानन में
    एक राजकुमारी रहती थी
    घर राजमहल सा लगता था
    हर रोज दिवाली होती थी !
    तेरे जाने के साथ साथ ,चिड़ियों ने भी आना छोड़ा !
    चुग्गा पानी को लिए हुए,उम्मीद लगाए बैठे हैं !

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  28. कहते हैं बेटी आँख का वो आँसू है जिसे छिपा भी नही सकते,और संजोकर रख भी नही सकते उसे तो बहना ही बहना है ।

    परम्पराओं का निर्वाह तो करना ही है ...समाज का ढांचा ही ऐसा है ....यही जीवन है ....सार्थक आलेख माहेश्वरी जी ...

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  29. भावुक क्षण होते हैं ये ...

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  30. बेटी आंख का वो आंसू है जिसे छिपा भी नही सकते , और संजोकर रख भी नही सकते… उसे तो बहना ही बहना है
    बहुत मर्मस्पर्शी है यह विषय …
    बेटी तो बेटी है उसे विवाह के बाद हर हाल में बाबुल को छोड़ कर जाना ही है
    यही व्यवस्था है … और बेटी को विदा करना ही हर मां-बाप का धर्म है ।
    आदरणीया महेश्वरी कनेरी जी
    प्रणाम !


    भावनाप्रधान आलेख है ।


    वैसे हम चार वर्ष पहले बहू लाये थे तो विदाई के वक़्त समधीजी को गले लगाते हुए हमारे भी आंसू छलक आए थे … अब हमारी तीन वर्ष की पोती है , अभी से उसके विवाह की कल्पना करके आंखें भर आती हैं …
    बेटी तो है धन ही पराया …


    शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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